KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

आखिर क्यों पंछी पिंजरा में बंद होने की याचना कर रही है? नरेन्द्र कुमार कुलमित्र जी यह कविता जरूर पढ़िये (Ek pinjara de do mujhe)

एक पिंजरा दे दो मुझे
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एक दिन
सुबह-सुबह
डरा-सहमा 
छटपटाता 
चिचिआता हुआ एक पंछी
खुले आसमान से
मेरे घर के आंगन में आ गिरा
मैंने उसे सहलाया
पुचकारा-बहलाया
दवाई दी-खाना दिया
कुछेक दिन में चंगा हो गया वह
आसमान की ओर इशारा करते हुए
मैंने उसे छोड़ना चाहा
वह पंछी
अपने पंजों से कसकर
मुझे पकड़ लिया
सुनी मैंने
उसकी मूक याचना
कह रहा था वह–
‘एक पिंजरा दे दो मुझे।’
— नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
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