KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

आज बसंत में टूट रहे हैं(aaj basant me tut rahe hai)

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वर्षों से जुड़े हुए कुछ पत्ते
आज बसंत में टूट रहे हैं ।
जरूरत ही जिनकी पेड़ में
फिर भी नाता छूट रहे हैं।
यह पत्ते होते तो बनती पेड़ की ताकत ।
इन की छाया में मिलती सबको राहत ।
पर सबको मंजिल तक जाना है।
सबने बनाई है अपनी-अपनी चाहत ।
इन की विदाई से डाल-डाल सुख रहे हैं।
जरूरत थी जिनकी पेड़ में
फिर भी नाता छूट रहे हैं ।
इन पत्तों से ही पेड़ में होती जान ।
आखिर पत्तों से ही पेड़ को मिलती पहचान।
यह पत्ते ही भोजन पानी हवा दिला कर ।
बनते हैं जग में महान ।
इनके बिना पेड़ के दम घुट रहे हैं ।
जरूरत थी जिनकी पेड़ में
फिर भी नाता छुट  रहे हैं ।
मानो तो जीवन की यही परिभाषा ।
हर निराशा में छुपी रहती आशा ।
इनके जगह लेने कोई तो आएगा ।
यही भरोसा और यही दिलासा।
पतझड़ के बाद नई कोपले फूट रहे हैं ।
बरसों से जुड़े हुए पत्ते
आज बसंत में टूट रहे हैं।
जरूरत थी जिनकी पेड़ में
फिर भी नाता छूट रहे हैं।
मनीभाई ‘नवरत्न’, छत्तीसगढ़
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