KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

आसन्न

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आसन्न?

बैठी थी आसन्न वो मेरे
कर रही थी मुझसे ठिठोली
पल पल बढ़ी नज़दीक मेरे वह
दुश्मन की जब पहुंची टोली,

ठानी थी मैंनें ,दूंगा मात
दुश्मन की चाहे छिपी घात
डटकर करूंगा अरू सामना
लड़ मरनें की थी कामना

संकट मेरे आसन्न था
साथी भी मरणासन्न था
बची थी केवल गोली एक
सैनिक दुश्मन के थे अनेक

था लक्ष्य फ्यूल टैंक उड़ाना
दुश्मन का निशान मिटाना
साधा निशाना दी दाग गोली
खेमें उनके हुई आग की होली

बढ़ा अपनें साथी की ओर
थी टूट चुकी सांसो की डोर
सपूत भारती को नमन कर
आतंकियों का दमन कर

लौटा हूं आज वतन में
खिलीं कलिंया गांव चमन में
खुश है मां ,खुश है बहना
पत्नीं का वापस आया गहना

कुमुद श्रीवास्तव वर्मा..