KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

ऐसे न देखो मुझे

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ऐसे न देखो मुझे
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ऐसे न देखो मुझे ,
कि मैं केवल एक स्त्री हूँ ,
मुझमें माँ , बहन , बेटी ,
और गृह – लक्ष्मी का रूप ,
भी निहार लो।

माथे पर मर्यादा का आँचल ,
आँखों में ममता का सागर ,
हाथों में सेवा का गागर ,
हो सके तो इनसे अपना ,
जीवन सँवार लो ।

आस्था रखती हूँ मानवता में ,
अटूट संबंध  है दयालुता से ,
तप ही मेरा सर्वोत्तम गहना ,
इस गहने से तुम भी अपना ,
सहज श्रृंगार लो ।

हृदय भी है धड़कने वाला ,
अच्छा – बुरा समझने वाला ,
अनादर की अधिकारिणी ,
न थी कभी , न हूँ अभी ,
अपनी भूल सुधार लो ।

पिता , पुत्र , और भाई सम ,
जब तुम्हें देख सकती हूँ मैं ,
तब तुम क्यों भ्रमित होते हो ?
करोगे सदा सम्मान मेरा ,
अडिगता का प्रण , स्वीकार लो ।

– गीता द्विवेदी