KAVITA BAHAR
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और न जाने कितने वाद? (aur na jane kitne vaad?)

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जब भी जाने को होता दफ्तर ।
मन में यही रहता डर।
शायद लौट सकूँ अपने घर ।
पहले ये बात सिपाही ही समझता ,
जाता जब सीमा पर।
अब मैं भी समझता हूँ -” एक आम इंसान ।”
सीमा के अंदर रहते हुए भी ।
वाकई आसान नहीं है जीना ।
आतंकवाद ,नक्सलवाद,माओवाद
और न जाने कितने वाद ?
क्या हम आज भी आजाद हैं ?
बिखरकर रह जाता हूँ मैं
यही सोचते हुए ।
टुट जाता है सब्र पर टिकाई गई बाँध ।
बिलखती और बिछुड़ती जिन्दगी
हम देख चुके, सुन चुके
भूल चुके कि धरा वही, समाज वही ।
क्या कल हमारी बारी है ?
“हम रहे , ना रहे ” किसे है परवाह ?
जवान को,विज्ञान को या भगवान को।
मैं तो यही समझूँ कि
जिसने बोया है वही काटेगा ।
तभी तो मेरी नज़र सत्ताधारियों पर केंद्रित है ।
मनीभाई ‘नवरत्न’, छत्तीसगढ़