KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

कलम से, कलम से (kalam se,kalam se)

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कल तक जो मर गया था
आज जी उठा हूं फिर से
कलम से, कलम से।
गुमराह हो गई युवाशक्ति
विचलित भी ये नहीं होती
जैसे ठंडी बर्फ सी।
इसे पिघला दूंगा,
कलम से, कलम से।
पढ़े-लिखों की अनपढ़ जिंदगी
संभाले हुए हैं रंग भेद जाति
मानवता भी शर्मशार सी।
इन्हें मानव बनाऊंगा,
कलम से , कलम से।
उजड़ रही है स्वर्ग से सुन्दर धरा।
विस्फोटकों से सरहद का पहरा।
टेढ़ी नजरों से देखें पड़ोसी।
मैं प्रीत जगाऊंगा।
कलम से , कलम से।
✒️ मनीभाई”नवरत्न”,बसना, महासमुंद,छग