KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

कवयित्री विजिया गुप्ता समिधा अपने ख्वाहिशों को कविता के माध्यम से बता रही है जो हर किसी के ख्वाहिशों में शामिल होती हैं…

बस यही ख्वाहिश है मेरी
इक कली की उम्र पाऊँ,
फिर चमन में खिलखिलाऊँ,
किसी भ्रमर का प्यार पाऊँ,
तितलियों को भी लुभाऊँ,
माली का भी हित निभाऊं,
मुरझा कर फिर बिखर जाऊँ,
याद बनकर याद आऊँ,
बस यही ख्वाहिश है मेरी।
इक शमा की उम्र पाऊँ,
रोशन हो कुछ कर दिखाऊँ,
परवाने को भी रिझाऊं,
इबादत के भी काम आऊँ,
हर बूँद को मोती बनाऊँ,
रफ़्ता रफ़्ता पिघलती जाऊं,
याद बनकर याद आऊँ,
बस यही ख्वाहिश है मेरी।
इक शिला का रूप पाऊँ,
कुछ इस तरह तराशी जाऊँ,
मूक हो कर भी व्यथा सुनाऊँ,
मनमंदिर में बसाई जाऊँ,
मूर्तिकार की कल्पना सजाऊँ,
टूक टूक हो गुनगुनाऊँ,
याद बनकर याद आऊँ,
बस यही ख्वाहिश है मेरी।
——–
विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग छत्तीसगढ़

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