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कुछ मैं लिखूं – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस कविता में मैंने रचनाकारों को लिखते रहने के लिए प्रेरित किया है साथ ही जीवन में सफल जीवन की संभावनाएं के बारे में बात की गयी है |
कुछ मैं लिखूं – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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कुछ मैं लिखूं – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

कुछ मैं लिखूं
कुछ तुम लिखो
ये दुनिया
सुन्दर लेखनी का समंदर हो जाए
कुछ मैं गढ़ूं
कुछ तुम गढ़ों
ये दुनिया खूबसूरती से सराबोर हो जाए
कुछ मैं गाऊँ
कुछ तुम गाओ
ये वतन
देश प्रेम की भावना में डूब जाए
कुछ मैं सोचूँ
कुछ तुम सोचो
ये दुनिया
मानवता के आँचल में जीवन पाए
कुछ मैं जियूं
कुछ तुम जियो
ये दुनिया
सुविचारों के बाग़ से रोशन हो जाये
कुछ मैं बढूँ
कुछ तुम बढ़ो
ये दुनिया
उपलब्धियों के समंदर में डूब जाए
कुछ मैं कहूं
कुछ तुम कहो
ये दुनिया
विहारों की पृष्ठभूमि का आधार हो जाए
कुछ मैं उसे याद करूं
कुछ तुम उसे याद करो
ये दुनिया
उस परमतत्व के साए तले जीवन पाए
कुछ मैं संकल्प लूं
कुछ तुम संकल्प लो
यह दुनिया
सच्चाई मार्ग पर अग्रसर होती जाए
कुछ मैं आदर्श स्थापित करूं
कुछ तुम आदर्श स्थापित करो
ये दुनिया
आदर्शों के झंडे तले संस्कारित व पल्लवित होती जाए
कुछ मैं समर्पित हो जाऊं
कुछ तुम समर्पित हो जाओ
ये दुनिया
आपसी सामंजस्य का आइना हो जाए
कुछ मैं विश्राम लूं
कुछ तुम विश्राम लो
ये दुनिया
इसी तरह रोशन होती जाए

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