KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

कोई साल..आख़िरी नहीं होता

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कोई दिन ,
कोई महीना,
या कोई साल..
आख़िरी नहीं होता
जब हमारी आँखें खुलतीं..
नींद के गहरे सन्नाटों से
कोई बांग-सा बिगुल बजाता
जिसके ज्ञान तरंगों से
खुल जाते
हमारे मनोमस्तिष्क के पर्दे..
जैसे किसी निर्जीव ताल में
लुढ़क जाता हो
कोई पत्थर
और चोट पाकर वह
हो जाता हो सजीव !
तब होती जीने की शुरुआत
एक उत्सव की भांति ।
चाहे कोई दिन
कोई महीना
या कोई साल ।
✒️ मनीभाई’नवरत्न’
(३१दिसंबर विशेष)