KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

गंतव्य

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

गंतव्य


***
मैं नितान्त अनभिज्ञ हूं
कि कहां है मेरा गंतव्य
एक पथिक हूं
चलना सीख रहा हूं
नहीं जानता
क्या है मेरा भविष्य
अनजान पथ पर
चल पड़ा हूं
है लक्ष्य बड़ा ही भव्य!
हूं कृत संकल्पित
सांसारिक दुखों से
अति व्यथित
लोभ मोह वासना से
कदाचित आकर्षित
मेरा मंतव्य
आच्छादित है
दृश्य पटल पर
पर है जो दृष्टव्य
फर्क नहीं पड़ता
कौन क्या कहता है
मेरा चित्त हमेशा
खुद के साथ रहता है
प्रकृति ने मुझे दी है
सोच विचार करने की शक्ति
मस्त रहता हूं
निभाते हुए निज कर्त्तव्य।
पद्म मुख पंडा
ग्राम महा पल्ली