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घबराना नहीं है तुमको – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस कविता में जीवन संघर्ष के दौर में भी खुद पर भरोसा रखने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया गया है |
घबराना नहीं है तुमको – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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घबराना नहीं है तुमको – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

घबराना नहीं है तुमको
आगे है बढते जाना
रुकना नहीं है तुमको
आंधियों से है टकराना

पड़ेगा तुम पर भी
आधुनिकता का प्रभाव
एक ही फूँक से उड़ाकर
आगे है बढते जाना

मंजिल तुम्हारी चाहत है
यह सोच कदम बढ़ाना
घबराना नहीं है तुमको
आगे है बढते जाना

रुकना नहीं है तुमको
आंधियों से है टकराना
पीछे जो मुड़कर देख लोगे
खत्म हो जाओगे

रास्ते टेढ़े मेढे मगर
उचाईयों को छूते जाना
घबराना तनिक भी न तुम
तुम्हे पर्वतों से है टकराना

आँखों में हो आशा की चमक
मन में अंतर्विश्वास जगाना
घबराना नहीं है तुमको
आगे है बढते जाना

रुकना नहीं है तुमको
आंधियों से है टकराना
आंधियां भी चलेंगी
पर्वत भी हिलेंगे

पर कदम तेरे ए बालक
कदम दर कदम बढ़ेंगे
चीरकर हवाओं का सीना
तुझे है पर्वत पार जाना

थकान से तुझे क्या लेना
पतझड को सावन बनाना
घबराना नहीं है तुमको
आगे है बढते जाना

रुकना नहीं है तुमको
आंधियों से है टकराना

बनकर तू पृथ्वी
बनकर तू टीपू
बनकर तू तात्या
बनकर तू महाराणा
कर देश अभिमान
चरम पर छा जाना

बनकर तू गाँधी
बनकर तू लक्ष्मी
बनकर तू रानी
बनकर तू इंदिरा
हो देश पर न्योछावर
शहीद हो जाना

घबराना नहीं है तुमको
आगे है बढते जाना
रुकना नहीं है तुमको
आंधियों से है टकराना

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