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चलने दो जितनी चले आंधियां – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रचना के माध्यम से कवि जीवन में आ रही बाधाओं को पार कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है |
चलने दो जितनी चले आंधियां – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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चलने दो जितनी चले आंधियां – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

चलने दो जितनी चले आंधियां
आँधियों से डरना क्या
मुस्कराकर ठोकर मारो
वीरों मन में भय कैसा

चलने दो जितनी चले आंधियां

तूफानों की चाल जो रोके
पल में नदियों के रथ रोके
वीर धरा के पवन पुतले

चलने दो जितनी चले आंधियां

पाल मन में वीरता को
झपटे दुश्मन पर बाज सा
करता आसान राहें अपनी
तुझे हारने का दर कैसा

चलने दो जितनी चले आंधियां

भारत माँ के पूत हो प्यारे
लगते जग में अजब निराले
करते आसाँ मुश्किल सारी
तुझे पतन का भय कैसा

चलने दो जितनी चले आंधियां

पड़े पाँव दुश्मन की छाती पर
चीरे सीना पल भर में
थर – थर काँपे दुश्मन
या हो कारगिल , या हो सियाचिन

चलने दो जितनी चले आंधियां

पायी है मंजिल तूने प्रयास से
पस्त किये दुश्मन के हौसले
फ़हराया तिरंगा खूब शान से
नमन तुझे ए भारत वीर

चलने दो जितनी चले आंधियां

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