KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

जहां भी जाऊंगा ,छा ही जाऊंगा(jaha bhi jaunga, chha hi jaunga)

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जहां भी जाऊंगा ,छा ही जाऊंगा
बादल की तरह ,आंचल की तरह।
जहां भी जाऊंगा, वहां  सजाऊंगा
गुलशन की तरह, दुल्हन की तरह ।।
राहों के पड़े कचरे , डस्टबीन में ।
हरियाली बिखेरेंगे इस जमीन में।
जरूरतमंद की करूँ मैं सहायता ।
सिवा इसके, मैं  कुछ ना चाहता ।
जहां भी जाऊंगा खुशियां लाऊंगा
बहार की तरह , प्यार की तरह।।
छोटे छोटे बच्चे ,  जो पढ़ ना सके ।
गरीबी हालत में,आगे बढ़ ना सके ।
उन सबको बुलाके,मैं कक्षा लगाऊँ ।
मेहनत सिखाके,जिन्हें पास कराऊँ।
जहां भी जाऊंगा ,सबको हंसाऊँगा ।
जोकर की तरह , लाफ्टर की तरह।
सूखे सूखे बीज, मिट्टी में डाल के।
भोजन उन्हें दूँ ,पानी व खाद के ।
बढ़े वो मुझसे आगे बनकर के पेड़,
रोटी कपड़ा और मकान देते हैं पेड़।
जहां भी जाऊंगा धाक जमाऊँगा
चहेता की तरह, फरिश्ता की तरह।।
 मनीभाई ‘नवरत्न’, छत्तीसगढ़

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