KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

“जुल्मी-अगहन”

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

“जुल्मी-अगहन”
जुलुम ढाये री सखी,
अलबेला अगहन!
शीत लहर की कर के सवारी,
इतराये चौदहों भुवन!!
धुंध की ओढ़नी ओढ़ के धरती,
कुसुमन सेज सजाती।
ओस बूंद नहा किरणें उषा की,
दिवस मिलन सकुचाती।
विश्मय सखी शरमाये रवि- वर,
बहियां गहे न धरा दुल्हन!!जुलूम…..
सूझे न मारग क्षितिज व्योम-
पथ,लथपथ पड़े कुहासा।
प्रकृति के लब कांपे-
न बूझे,वाणी की परिभाषा।
मन घबराये दुर्योग न हो कोई-
  मनुज निसर्ग से अलहन!!जुलुम….
बैरी”पेथाई”दंभी क्रूर ने-
ऐसा कहर बरपाया।
चहुं दिशि घुमर-घुमर-
आफत की, बारिश है बरसाया।
नर- नारी भये त्रस्त,मुएॅ ने-
लई चतुराई बल हन!!जुलुम…..
माथ धरे मोरे कृषक सखा री,
कीट पतंगा पे रोये।
अंकुर बचे किस विधि विधाता-
मेड़-खार भर बोये।
शीत चपेट पड़ जाये न पाला-
आस फसल मोरी तिलहन!!जुलुम….
अंखिया अरोय समय अड़गसनी, असवन निकली सुखाने।
सरहद प्रहरी पिय के किंचित-
दरश हों इसी बहाने।
झांकती रजनी चांदनी चिलमन-
शकुन ठिठुर गइ विरहन!!जुलुम….
    ⛈☔
@शकुन शेंडे
छत्तीसगढ़