KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

जो चाहे ढल गए(jo chahe dal gaye)

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काम की बात करूंगा मैं,
क्योंकि काम से अपना नाता है।
काम से नाता होकर भी काम ना मिले मुझको ;
आज मुझ बेरोजगार की यही दास्तां है।

हर इम्तिहान में जीत गए,
फिर भी जो चाहे ढल गए।

फतह में भी काम ना बने ,
क्यों कयामत की कायदा हो गए ।
शुरू से अंत कदम पर , चित्त सदा लक्ष्य पर ।
अध्ययन के खर्च पर , अटकी दिलासा के दर्द पर।
अभागे दिन भूलकर , जो खुश होते रहे ।
फिर भी जो चाहे ढल गए।

दुआओं का हुआ ना असर , है रिश्वतखोरी के तेवर ।
बैठा हूं आज झुंझलाकर , ना कोई समझ ना खबर।
जिंदगी के सफ़र में हार को जीत कर गए ।
फिर भी जो चाहे ढल गए।

अब बेरोजगारी की परिभाषा आ गई ।
हम पर भी धन का जुनून छा गई ।
ना कोई जमीन का टुकड़ा है।
जन्मों से वही प्यासी मुखड़ा है।
तपती ख्वाब में राख से हाथ जला गए।
फिर भी जो चाहे ढल गए।

मनीभाई ‘नवरत्न’