KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

प्रतिरूप

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? प्रतिरूप ?

चित्र पर
क्या लिखूँ
कैसे लिखूँ
कब लिखूँ
किसके लिए लिखूँ
सोंचती रही
बहुत देर तक
जिन्दगी तेरे लिए
या
दोस्तों के लिए
या
देश या
समाज के नाम
या
अपने आदरणीय
गुरूजनों के लिए
और भी बहुत कुछ
याद आया
बहुत सोचा
पर कुछ
समझ न आया
बस माँ ही याद आयी
याद आयी *माँ की ममता*
मेरी प्यारी माँ
जिसने जिन्दगी दी
दोस्त बनकर साथ दिया
देश और समाज का
अर्थ समझाया
गुरूजनों को
सम्मान करना सिखाया
और सब
जो भी सोचा
सबमें माँ ही
प्रतिबिम्बित हुई
माँ आज नहीं
हो पास
पर
दूर भी तो नहीं
सोचूं तो तुझ जैसा
करीब भी कोई नही
इतनी करीब कि
तुम हो
मेरी अंतरात्मा में
मेरे ह्दय तल में
बस तुम्ही तो हो
और हो भी
क्यों न
तुमसे ही तो मैं हूँ
तुम्हारा ही प्रतिरूप हूँ
सच माँ
तुम
बहुत याद आती हो••••!

—–अनिता मंदिलवार “सपना”