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प्लेटफार्म – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रचना के माध्यम से प्लेटफ़ॉर्म के बारे में लोगों की राय को साझा किया गया है | यात्री प्लेटफ़ॉर्म के बारे में क्या – क्या सोचते हैं इस विषय को इस रचने में प्रमुखता से स्थान दिया गया है |
प्लेटफार्म – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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प्लेटफार्म – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

मै अपनी
यात्रा के एक चरण
में
ट्रेन में बैठा
अपनी मंजिल की ओर
बढ़ रहा हूँ
बीच यात्रा में
एक प्लेटफार्म
का दृश्य देख
कुछ लिखने की उत्सुकता
मन में जागृत हुई
प्लेटफार्म शब्द
हमारे मन में
अनके विचारों
को जन्म
देता है
कुछ इसे
यात्रा के बीच
एक पड़ाव
मानते हैं
कुछ इसे
अल्पकाल के लिए
एक सराय
मानते हैं
कुछ इसे तफरी के लिए
सबसे उपयुक्त
जगह मानते हैं
तो इसे कुछ
लोग समय
पास करने का सर्वश्रेष्ठ
साधन मानते हैं
कुछ इसे मंजिल की
यात्रा का एक पड़ाव मानते हैं
पर मै इसे
कुछ दूसरे
नज़रिए से देखता हूँ
प्लेटफार्म शब्द
मेरे लिए
विभिन्न संस्कृतियों ,
संस्कारों, विचारों
के मिलन की
एक ऐसी अनुपम कृति है
जहां बिखराव नहीं दिखाई देता
यह एक जुड़ाव का केंद्र है
यह भिन्न – भिन्न
समुदायों रीतिरिवाजों
खान-पान व व्यवहारों
को एक दूसरे से
जोड़ने का ऐसा माध्यम है
जो भारत जैसे देश में
अनेकता में एकता को
चरितार्थ करता है
प्लेटफार्म पर
कुछ लोग अनमने से
कुछ अपनी ट्रेन का
इंतज़ार करते
कुछ एक स्वादिष्ट
व्यंजनों में व्यस्त
कुछ बोझ के मारे
कुली की बात टोहते
कहीं चाय-चाय की आवाज
तो कहीं पकोडे वाले का
अलग सा अंदाज़
बच्चों को अपनी और आकर्षित
करते खिलोने वाले
कहीं रिश्तेदारों
को लेने आये लोग
इस बात से परेशान हैं
कि ट्रेन लेट क्यों हैं
तो कहीं
गरीब बच्चे
लोगों को
करतब दिखाते
अपने पेट
की भूख के
जुगाड़ में
तो कोई
पान की पीक को
कहीं किनारे
धीरे से
पिचकारी मार
अपने मुख की
कुंठा को शांत करता
तो किसी
को अपनी
ट्रेन चूक जाने
का गम
ये सारे दृश्य
एक प्लेटफार्म
की गरिमा को
और विस्तार देते हैं
ये सारे चरित्र
प्लेटफार्म को
गरिमामय स्वरूप
प्रदान करते हैं
अनाउंससमेंट होते ही
अपने – अपने सामान
के साथ तैयार लोग
ट्रेन में बैठ
प्रस्थान करते दिख रहे हैं

इसी बीच
मेरी भी ट्रेन की
घंटी सुनाई दी
और मै
अपनी आगे की यात्रा
की ओर
बढ़ चला
इसी उम्मीद से
कि
सभी दूसरे
यात्रीगण
भी अपनी – अपनी मंजिल
तक सुरक्षित पहुचें

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