KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

मधुर लालसा सखे हृदय में

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*विधा—गीत*

*विषय—लालसा*

जीवन के इस मध्यभूमि में
           प्रेम से सिचिंत कब होंगें।
*मधुर लालसा सखे हृदय में*
      *प्रेम प्रवाहित कब होंगें।।*

कभी मिलन के सुखद योग में
            कभी याद की नौका में।
कभी सतायें विरह वेदना
           कभी बावड़ी चौका में।।
मधुरजनी में सुनों सखे रे!
          प्रेम से सिचिंत तब होंगें
*मधुर लालसा सखे—————–*

प्रेम तपोवन की शाखा है
        मीत तुझे है ज्ञात नहीं।
तरल हँसी अधरों पर गूँजे
      नयन बाँकपन नाप रही।।
सुभगे की जब याद सतायें
       प्रेम से सिचिंत तब होंगें
*मधुर लालसा————————-*

खुले नयन से स्वप्न दिखें जब
          यौवन में अभिलाषा हो।
अनायास पलकें झुक जायें
            तेज गती में श्वासा हो।।
कुछ कहना हो, कह नहि पाओं
           प्रेम से सिचिंत तब होंगें
*मधुर लालसा————————-*

वाणी अधरों पर रुक जायें
          परवशता में हृदय रहें।
कोई क्या उर में आ बैठा
           सखे! यहीं तू बात कहें।।
तन-मन दोनों जब समान हों
          प्रेम से सिचिंत तब होंगें
*मधुर लालसा————————–*

सुनों सखे रे! तुझे बताऊँ
        रंच चकित मत हो जाना।
उर परिवर्तित दिखें तुझे जब
         प्रेम गीत तुम तब गाना।।
जीवन मरण सभी हो निश्चित
          प्रेम से सिचिंत तब होगें
*मधुर लालसा————————–*

*गगन उपाध्याय”नैना”*