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मेरे मन पंछी(mere mann panchhi)

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मेरे मन पंछी क्यों आकाश में उड़ना चाहे ?
इस शोर बोर संसार से मुक्त होना चाहे ।
यह रिश्तो में न बंध कर आजाद चाहे ।
अशांति छोड़कर प्रकृति से लगाव चाहे ।
जग दृष्टि से न बने महान ना अज्ञान ।
बने स्वयं की जिंदगी की शान ।
मेरे मन को क्या हुआ मैं ना जानू ।
इस दुनिया से कुछ मिले मैं ना मानूं ।
इस किचकिच रोजमर्रा से शांत चाहे ।
इस भीड़ भाड़ से हटकर एकांत चाहे ।
अपने दर्दों को जानने वाला इंसान चाहे।
घाव भरने के लिए एक मेहमान चाहे।
अज्ञान मिटाने के लिए गुरु ज्ञान चाहे ।
इस बेजान शरीर पर  मौजान चाहे ।
मेरे स्वभाव को देखकर यह संसार ना भाये।
जो मेरे मन को चुभे  वह संसार गाये
हे प्रभु! आप ऐसा कर जाओ ।
आप मुझे यथास्थिति ढलाओ।
मुझे सांसारिक जीवन में ध्यान लगाओ।
इस संसार में मुझे बहलाओ ।
क्या यह संभव ना हो कि युग बदले ?
इस दुषित तन को धोकर फिर सज ले।
जन में छुपी बुराई मैल को मल ले ।
मेरा अकेला मन इस जनों में फिर  मिल ले।
मनीभाई ‘नवरत्न’,छत्तीसगढ़,