KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

पेरा ल काबर लेसत हो

पेरा ल काबर लेसत हो

तरसेल होथे पाती – पाती बर, येला काबरा नइ सोचत हो!
ये गाय गरुवा के चारा हरे जी , पेरा ल काबरा लेसत हो !!
मनखे खाये के किसम-किसम के, गरुवा बर केठन हावे जी !
पेरा भुसा कांदी चुनी झोड़ के, गरुवा अउ काय खावे जी !!
धान लुआ गे धनहा खेत के, तहन पेरा ल काबर  फेकत हो !
तरसेल होथे पाती-पाती बर, येला काबर नइ सोचत हो।।
अभी सबो दिन ठाढ़े हावे,जड़काला में नंगत खवाथे न  !
चईत-बईसाख  खार जुच्छा रहिथे, कोठा में गरुवा अघाथे न !!
वो दिन तहन तरवा पकड़हू, अभी पेरा ल काबर फेकत हो !
तरसेल होथे पाती-पाती बर, येला काबर नइ सोचत  हो !!
काय तुमला मिलत हे ,पेरा ल आगी लगाए म !
एक मुठा राख नई मिले, खेत भर भुर्री धराये म।।
अपने सुवारथ के नशा म, गरुवा काबर घसेटत हो !
तरसेल होथे पाती-पाती बर, येला काबर नइ सोचत हो !!
झन लेसव झन बारव रे संगी,लक्ष्मी के चारा पेरा ल !
जोर के खईरखाडार में लाओ, खेत के सबो पेरा ल !!
अनमोल हवे सबो जीव बर, येला काबर नई सरेखत हो !
तरसेल होथे पाती-पाती बर, येला काबर नइ सोचत हो !!
शब्दार्थ –  तरसथे = तरसना, पाती=पत्ती, पेरा = पैरा, लेसना = जलाना, बरिक दिन = बारह माह,  किसम-किसम= अनेक प्रकार के, भुर्री= ऐसी आग जो छड़ भर में बुझ जाए,  कांदी =घास, जुच्छा = खाली , तरवा = सीर, खईरखाडार = गऊठान
सरेखना = मानना/समझना !
दूजराम-साहू “अनन्य “
निवास -भरदाकला 
तहसील -खैरागढ़ 
जिला-राजनांदगांव (छ .ग. )