KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

शीर्षक – मेरा प्यार( हिंदी कविता) रचयिता सुशील कुमार राजहंस

शीर्षक – मेरा प्यार ( हिंदी कविता)
आज के प्रेम और पुराने प्रेम में अंतर और सोच का नजरिया
रचयिता सुशील कुमार राजहंस

शीर्षक – मेरा प्यार ( हिंदी कविता)

बात हमारी सुना रहा हूं , इस नये जमाने को ।
किन हालातों से हूं गुजरा , पल भर तुझे पाने को ।
अपने तजुर्बे की पन्नों में लिखी , दास्तां सुनाता हूं ।
सीने में थमती सांस की , व्यथा का हाल बताता हूं ।
एक लड़की सुशील भोली सी ,
जिसकी प्रीत बिना रह नहीं पाता हूं ।
जिसके एहसास का हर लम्हा ,
मस्ती में झूम झूम कर बिताता हूं ।
फिल्मी दुनियां से जरा हट कर ,
उनसे हमारी पहली मुलाकात थी ।
अदाकारी और करामात से पिरोयी ,
वाकई सबसे अनोखी उनमें बात थी ।
मंत्र मुग्ध कर दे हर शक्स को वो ,
सादगी की ऐसी सौगात थी ।
जानती थी प्यार से जीतना लोगों को ,
हमारी तो एक वही कायनात थी ।
कमबख्त वो वक़्त , उन पर नजर जो मेरी पड़ी ।
इजहार ए मोहब्बत की थी , ये शुरुआती कड़ी ।
परिणाम की चिंता और भय थी , उलझन की घड़ी ।
जब उसने भी कहा हां , तब मिली मुझे सुकून बड़ी ।
तब होने लगी जान पहचान , बढ़ने लगी बात आगे ।
कल्पनाओं में लिप्त मन , बुनने लगा प्रेमरस के धागे
न देखकर हमें वो मुस्कान देते ,
नहीं अपनी मधुर वाणी की तान देते ।
घमंडी और मगरूर होती वो ,
तब उनसे हम अनजान होते ।
किन्तु वो तो थीं अमृत की मधु प्याला ,
जिसे पाने को हम अपनी जान दे देते ।
हमें न कोई तकलीफ , न हुई कोई गम ।
मनमौजी थे , खुशी से उछल पड़े हम ।
थी चंचल सी जिन्दगी में , सुखद भरी हमारी राहें ।
उम्मीदों की किरण खड़ी थी , आस में फैलाए बाहें ।
और शायद !
इसी आवारगी में ही तो , ईश्क की शुरुआत होती है
मन में उठती भावनाओं की , दिन रात बात होती है ।
कभी इनकार तो कभी तकरार होती है ।
त्याग और जिम्मेदारी से भी प्यार होती है ।
जैसे जैसे समय गुजरा ,
बचपना खत्म जवानी आ गयी ।
यौवन का उभरता आकर्षण ,
कयामत सी ला गयी ।
हां चाहूँ की वो मुझे देखती रहे , मैं उसे देखता रहूं ।
थम जाये पल यूं ही , न वो कुछ कहे न मैं कुछ कहूं ।
मैं रोज उसकी यादों की गहराई में ,लीन हो जाता हूं ।

अपनों के मेले में अकेला मैं, उससा मीत न पाता हूं ।

अक्सर स्वप्न तब छलते हैं , मोह के धागे बदलते हैं ।

घबराती, कांपती,शरमाती रूह , बेचैन हो मचलते हैं
तब कातिल निगाहें , स्नेह सागर में डूब जाती है ।
खुलकर उनकी बाहों में , कसकर सिमट जाती है ।
जुल्फें जब उसकी, मेरे अधरों पर आती है ।
सारी इंद्रियां लूट के, मदहोश कर जाती है ।
तभी
मन भ्रमर का हंगामा , खता से पहले रूक जाता है ।
अनमोल जज्बात , फरेब के जाल से ऊब जाता है ।
मुझे प्रेम में , घिनौने खेल खेलना नहीं आता है ।
लालसा और वासना का , तालमेल नहीं खाता है ।
मुझे खुद को , तूझपर अर्पण करना आता है ।
ऐसा ही तेरे मेरे प्रीत का , जन्मों तक नाता है ।
लैला मजनूं की इतिहास , प्यार का सच बताती है ।
गर समझ सको रिश्ता , विश्वास का मोल जताती है ।
लोगों को करने दो , जग के रस्मों रिवाजों की बाते ।
प्यार तो दोनों ओर से पलता है , देकर पवित्र नाते ।
मेरा प्यार न कभी पुराना था , और न अब पुराना है ।
मुझे तो इस अथाह प्रेमकोश की , दवा चुराना है ।
मत पूछ मेरा ये दिल , तेरा कितना बड़ा दिवाना है ।
मन का दर्पण देख कभी , जिसमें तेरा ही ठिकाना है
कब तक यूं ही चलेगा , जिन्दगी का रूठना मानना ।
घुटन और प्यास की आदत का , ये घाव छिपाना ।
नहीं आता मुझे ,प्यार की सीमा को व्यक्त कर पाना ।

नामुमकिन सी उलझी जिन्दगी की ,पहेली सुलझाना
जरूरी है हकीकत की बुनियाद से , अस्तित्व पाना ।

भौतिक चैन और अश्लील नजरिए का ,ढोंग हटाना
खत्म हो जाये यह जिस्म ,तब सब खत्म हो जायेगा
पागल प्रेम आखिर , आजाद हो राहत से सो पायेगा
ये कैसी दुर्दशा है मेरी , पीड़ा में भी दुआ दे जाता हूं ।
मैं भी रोते ,टूटते हुए , आस का दीपक जलाता हूं ।
उसे भुलाने की कोशिश में , ज्यादा करीब पाता हूं ।
उसकी चाहत के रंग में , सदा के लिए रंग जाता हूं ।
चिंता और जिद के आगे , जोर किसका चला है ।
इसी उत्तेजना के कारण ही तो , रुसवा पला है ।
भले बेशर्म हूं , पर जमीर मेरी अभी मरी नहीं ।
कायम हूं अपने वादे पर , ये कोई मसखरी नहीं ।
काश !
तुम भी मुझे इस हद तक , प्यार करती होगी ।
मेरे जैसा हाल , ख्याल ,तुम भी महसूस करती होगी।

तुम्हारा
सुशील
रचयिता सुशील कुमार राजहंस

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