सरसी छंद विधान – होलिका आई

होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय और नेपाली लोगों का त्यौहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली रंगों का तथा हँसी-खुशी का त्योहार है। यह भारत का एक प्रमुख और प्रसिद्ध त्योहार है, जो आज विश्वभर में मनाया जाने लगा है। विकिपीडिया

सरसी छंद विधान – होलिका आई

holi-kavita-in-hindi
holi-kavita-in-hindi

सरसी छंद विधान: —
१६ + ११ मात्रा ,पदांत २१(गाल)
चौपाई+दोहा का सम चरण


हम भी छेडें राग
बीत बसंत होलिका आई,
अब तो आजा मीत।
फाग रमेंगें रंग बिखरेंगे,
मिल गायेंगे गीत।

खेत फसल सब हुए सुनहरी,
कोयल गाये फाग।
भँवरे तितली मन भटकाएँ,
हम भी छेड़ें राग।

घर आजा अब प्रिय परदेशी,
मैं करती फरियाद।
लिख लिख भेज रही मैं पाती,
रैन दिवस करि याद।

याद मचलती पछुआ चलती,
नही सुहाए धूप।
बैरिन कोयल कुहुक दिलाती।
याद तेरे मन रूप।

सजन लौट के प्रिय घर आजा,
तन मन चाहत मेल।
जलता बदन होलिका जैसे,
चाह रंग रस खेल।

मदन फाग संग बहुत सताए,
तन अमराई बौर।
चंचल चपल गात मन भरमें,
सुन कोयल का शोर।

निंदिया रानी रूठ रही है,
रैन दिवस के बैर।
रंग बहाने से हुलियारे,
खूब चिढ़ाते गैर।

लौट पिया जल्दी घर आना।
तुमको मेरी आन।
नहि,आए तो समझो सजना,
नहीं बचें मम प्रान।
. ———
बाबू लाल शर्मा “बौहरा” विज्ञ

इस रचना को शेयर करें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top