कल्पना से परे प्रेम
प्रेम
किसी को पकड़ने का नाम नहीं,
प्रेम है
पकड़ने की जरूरत से
मुक्त हो जाना।
जब सारी उम्मीदें
टूटकर गिर जाती हैं,
जब यह साफ दिखने लगता है
कि
अचेत मनुष्यों के बीच
प्रेम संभव ही नहीं—
तभी
प्रेम की पहली संभावना
जन्म लेती है।
यह समझ आना कि
जिसे हम प्रेम कहते रहे,
वह प्रेम था ही नहीं—
यही
जागरण की शुरुआत है।
बहुत समय तक
हम असंभव के पीछे
भागते रहे,
खोखली आशाओं को
सच मानते रहे।
और हर झूठी आशा
अंततः
पीड़ा में बदल गई।
प्रेम
घावों पर मरहम नहीं,
प्रेम वह दृष्टि है
जो घाव
होने ही नहीं देती।
हम कल्पना करते रहे—
कहीं कोई होगा,
कभी कोई आएगा,
जो हमारे भीतर की
रिक्तता भर देगा।
उम्मीदें बाँधते रहे,
और फिर
निराशा को
भाग्य कह दिया।
जिस क्षण
इस अपेक्षा से
पूर्ण मुक्ति मिलती है,
उसी क्षण
वास्तविक प्रेम
जन्म लेता है।
अपने जीवन में
स्पष्टता लाओ।
अपनी जंजीरों को देखो,
और उन्हें
धीरे-धीरे
खोल दो।
अधूरापन
किसी और से नहीं,
समझ से मिटता है—
यह जानकर
कि इच्छाएँ
कैसे उठती हैं,
कैसे
हमें बाँध लेती हैं।
तब
प्रेम कोई सपना नहीं रहता,
कोई दूर की कल्पना नहीं—
वह
तुम्हारी
स्वाभाविक अवस्था
बन जाता है।





