ऊष्मा में टूटता प्रेम
जो प्रेम
रसायन की देन है
वह ताप माँगता है,
निकटता का दबाव,
परिस्थिति की अनुकूलता।
थोड़ी-सी गर्मी,
थोड़ा-सा आकर्षण,
और दो अस्तित्व
बंधन में बँध जाते हैं—
जैसे हाइड्रोजन
ऑक्सीजन से मिलकर
पानी बन जाए।
देखने में
दोनों विलीन हो गए,
कुछ नया जन्मा।
पर सत्य यह नहीं।
वे गए नहीं,
बस छिप गए।
परिस्थिति बदली,
बंधन टूटा,
और दोनों
फिर अपने-अपने नाम से
खड़े हो गए।
ऐसा ही है
अधिकांश मानवीय प्रेम—
वस्तुओं का मिलना,
वस्तुओं का बिछुड़ना।
शर्तों पर टिका सपना,
शर्तें टूटीं
तो सपना भी।
तो क्या
प्रेम रसायन से परे
संभव है?
हाँ—
जब स्वयं
खुद को अनावश्यक समझ ले,
जब पाने की जिद
घुलने की तैयारी बन जाए।
जहाँ
मैं बचा न रहे,
वहाँ
प्रेम बचता है।
यही दृष्टि
बुद्धि है,
यही जागरूकता
प्रेम की पहली
और अंतिम शर्त।





