“जैसे हो, वैसे ही रहो?”
गलत के साथ रहने से
अकेला होना
कहीं बेहतर है।
पूछो अपने मन से—
जो तुम्हारे साथ है,
वह तुम्हें
बल दे रहा है
या
धीरे-धीरे
कमज़ोर बना रहा है?
क्या वह
तुम्हें मुक्त करता है,
या
देखभाल के नाम पर
पिंजरे में
ढाल देता है?
जो सीमाएँ खींचे,
जो उड़ान से डरे,
जो कहे—
मैं तुम्हारी भलाई चाहता हूँ
और तुम्हें
छोटा बनाए रखे—
वह न मित्र है,
न प्रेमी।
जो तुम्हें
तुम्हारी कमज़ोरियों में
आराम से
सड़ने दे,
वह उपहार नहीं,
वह
सुस्त ज़हर है।
जो कभी
तुम्हारे झूठ को
तोड़ने का साहस न करे,
वह
तुम्हारे कारागार को
और मज़बूत कर रहा है।
और जो
मुस्कराकर कहे—
“मैं तुम्हें
जैसे हो
वैसे ही प्यार करता हूँ”—
समझ लेना,
यह प्रेम नहीं,
यह
सबसे खतरनाक
नींद की दवा है।
भागो।
तुम्हारा प्रेमी
वह होना चाहिए
जो तुम्हें
बार-बार ठुकराए,
ज़रूरत पड़े तो
दिन में
चालीस बार।
जो
तुम्हारे भ्रमों से
सांठगांठ न करे।
जो
अहंकार को
घायल करे
ताकि
सत्य साँस ले सके।
यह क्रूरता नहीं,
यह
करुणा है—
उस संभावना के लिए
जो तुम हो सकते हो।
प्रेम
आग है।
वह
जो तुम नहीं हो
उसे जला देता है।
फिर
कैसे रह सकते हो
उसके साथ
जो फुसफुसाए—
छोटे रहो,
मंद रहो,
मेरे रहो?
कैब का इंतज़ार मत करो—
जान बचाकर
भागो।





