मन और भावनाएँ

खोल से बाहर

मन और भावनाएँ

खोल से बाहर आकाश से प्रेमकोई भावना नहीं है।वह एक असहजता है—उस हर सीमा के प्रतिजिसे तुमने कभीघर मान लिया था। हर जीवनकिसी न किसी खोल मेंशुरू होता है।खोल सुरक्षा देता है,ऊष्मा देता है,पहचान देता है।शुरुआत मेंवह आवश्यक होता है। पर जो आवश्यक था,वहीस्थायी नहीं हो सकता। एक बिंदु आता हैजब वही खोलजिसने बचाया था,दम

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न ट्रॉफी, बस खेल

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न ट्रॉफी, बस खेल (No Trophies, Just Play) जब भीतर पूर्ण हो,तो दुनिया सेसाथ माँगने नहीं जाते। जब भीतर पूर्ण हो,तो दुनिया सेकोई शिकायत भी नहीं रहती। तब कर्म होता है—तेज़, जीवंत,पर फल की भीख के बिना। कहते हैं जीवन कोकोई प्रेरक चाहिए।पर क्या वह प्रेरणाहीनता और कमी की भावना होनी चाहिए? हम जमा करते

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जलवायु पतन का भावनात्मक इंजन

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“जलवायु पतन का भावनात्मक इंजन” हम जंगल से उठे,और जंगल को हीखाने लगे। क्योंकिहम बुद्धि से नहीं,भावना सेचलने लगे। एक इच्छा उठती है—विदेश यात्रा।दिल रोमांच से भरता है।आकाश मेंएक और उड़ान,धरती परएक और बोझ। भावनाकार्बन बन जाती है। एक सपना पलता है—अपना सुरक्षित घोंसला।सीमेंट,स्टील,पेड़ कटते हैं। डर कहता है—और बड़ा,और पक्का। डर भीकार्बन है। एक

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दूसरा जन्म

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दूसरा जन्म मनुष्यजन्म से नहीं बनता।मनुष्यबनना पड़ता है। गर्भ से निकलनापर्याप्त नहीं,देह मिल जानामानव होना नहीं है। मानवताकोई जैविक उपहार नहीं,यहएक संभावना है—जिसेजगाना पड़ता है। जन्म के साथहम शुद्ध नहीं आते,हम साथ लाते हैं—अज्ञान,लोभ,वासना,भय,ईर्ष्या। हम इनसे ऊपर नहीं,इन्हीं के भीतरपैदा होते हैं। यदि कुछ नहीं बदला,यदि भीतरक्रांति नहीं हुई,तो जीवनकेवलदेह की पटकथा बन जाता है—भूख

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तैयार होने से पहले कूदो

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तैयार होने से पहले कूदो ताक़तकोई जमा पूँजी नहीं है।वहप्रतिक्रिया है। अधिकांश लोगएक अजीब विश्वास मेंघुटते रहते हैं—कि हम कमज़ोर हैं,असमर्थ हैं,शायद बेकार भी। हम बहुत सी बातों मेंसंदेह करते हैं,पर एक बात मेंअद्भुत रूप सेनिश्चित होते हैं—मेरे पासइतनी शक्ति नहीं है। और इस विश्वास के पक्ष मेंहमारे पासतर्क हैं,स्मृतियाँ हैं,अनुभवों काएक पहाड़ है—जो इसधीमे

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यह रासायनिक अस्तित्व

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यह रासायनिक अस्तित्व एक शब्दकान से टकराता है—औरपूरा शरीरउथल-पुथल में आ जाता है। एक शब्द,औरतापमान बढ़ जाता है।हृदय तेज़ हो जाता है।श्वास बदल जाती है। यह क्या है? यदिरासायनिक प्रतिक्रिया नहीं,तोऔर क्या है? यह देहरसायनों का ढेर है। इसमेंरासायनिक विचार उठते हैं।रासायनिक भाव बहते हैं।रासायनिक इच्छाएँआकर्षित करती हैं।रासायनिक भयसिकोड़ते हैं।रासायनिक महत्वाकांक्षाएँदौड़ाती हैं।रासायनिक प्रेमआसक्ति बन जाता

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टाई में बँधा जंगल

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टाई में बँधा जंगल शिक्षा क्या है?रोटी कमाने की तरकीबयाऐसा जीवन गढ़ने की कलाजो जीने योग्य हो? एक बात मेंजानवर हमसे बेहतर रहे—उन्हेंअपने होने का बोझ नहीं ढोना पड़ता।न आत्मचेतना का जाल,न आत्मविनाश की योजनाएँ।वे सीधे हैं,सरल हैं,और अपने जंगल मेंईमानदार हैं। मनुष्य भीएक जानवर ही जन्म लेता है,पर उसे मिलाएक खतरनाक उपहार—ऊपर उठने की

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आधा और आधा एक चौथाई होता है

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Half and Half Is a Quarter(अतुकांत हिंदी कविता – भावानुवाद) अकेलेपन से जन्मे रिश्तेपूरा नहीं करते—वेआधेपन कोसिर्फदूसरे आधे सेढक देते हैं। अधिकतर रिश्तेसम्पूर्णता से नहीं,कमी से शुरू होते हैं। मैं तुम्हें चाहिए,तुम मुझे चाहिए—यह मिलन नहीं,यह समझौता है। मैं तुम्हारी चाह पूरी करूँगा,तुम मेरी।लेन-देन कीइस चुप डील कोहमप्रेम कह देते हैं। और जिस दिनकोईकाम का

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प्यार जो आपको आज़ाद करता है

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Love That Sets You Free(अतुकांत हिंदी कविता – भावानुवाद) अगर किसी रिश्ते कोपरखना हो,अगर संगति कीगुणवत्ता जाननी हो—तोया तोसच की बात शुरू करो,याफालतू शोरबंद कर दो। खुद से पूछो—क्या यह प्रेम है?तो देखो,उस व्यक्ति की संगतितुम्हारे भीतरक्या जगाती है— उथल-पुथलयाशांति? क्या वहअपनी मौजूदगीमनवाना चाहता है,यातुम्हेंअपने पैरों परखड़ा करना चाहता है? क्या उसके पास रहकरअसुरक्षाऔर अधिकार-बोधबढ़ता

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“जैसे हो, वैसे ही रहो?”

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“जैसे हो, वैसे ही रहो?” गलत के साथ रहने सेअकेला होनाकहीं बेहतर है। पूछो अपने मन से—जो तुम्हारे साथ है,वह तुम्हेंबल दे रहा हैयाधीरे-धीरेकमज़ोर बना रहा है? क्या वहतुम्हें मुक्त करता है,यादेखभाल के नाम परपिंजरे मेंढाल देता है? जो सीमाएँ खींचे,जो उड़ान से डरे,जो कहे—मैं तुम्हारी भलाई चाहता हूँऔर तुम्हेंछोटा बनाए रखे—वह न मित्र है,न

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बसंत और बदलाव / मनीभाई नवरत्न

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बसंत और बदलाव पर प्रेरक हिंदी लेख। जानिए कैसे बसंत ऋतु हमें जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और नए आरंभ की प्रेरणा देती है।

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समझ / मनीभाई नवरत्न

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समझजानकारी नहीं है।जो पढ़ ली जाए,याद कर ली जाए—वह समझ नहीं। समझवह हैजो देखने के बादबदलने को विवश कर दे। जो सच दिखा देऔर फिरपुराना बने रहनाअसंभव कर दे—वही समझ है। समझभावना नहीं है।आँसू आ जाएँ,दिल भर आए—यह संवेदना हो सकती है,समझ नहीं। समझतब होती हैजब आँसू नहीं,भ्रम गिरते हैं। जबदोष देना छूटता है,शिकायत थमती

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