टाई में बँधा जंगल

टाई में बँधा जंगल

शिक्षा क्या है?
रोटी कमाने की तरकीब
या
ऐसा जीवन गढ़ने की कला
जो जीने योग्य हो?

एक बात में
जानवर हमसे बेहतर रहे—
उन्हें
अपने होने का बोझ नहीं ढोना पड़ता।
न आत्मचेतना का जाल,
न आत्मविनाश की योजनाएँ।
वे सीधे हैं,
सरल हैं,
और अपने जंगल में
ईमानदार हैं।

मनुष्य भी
एक जानवर ही जन्म लेता है,
पर उसे मिला
एक खतरनाक उपहार—
ऊपर उठने की संभावना
या
बहुत नीचे गिरने की छूट।
यह वरदान नहीं,
एक संभावना है।
इसे साधना पड़ता है।

पर हमने क्या किया?
हमने इसे
बढ़ाया नहीं,
बेचा।

हमने
आत्मा के बिना शहर बनाए,
करुणा के बिना व्यवस्थाएँ,
और विवेक के बिना संस्थान।
और फिर हैरान हुए—
जब वे ढहने लगे।

सच कहूँ—
अगर तुम्हारा घर,
तुम्हारा करियर,
तुम्हारी सरकार
भीतर की सच्चाई का
सम्मान नहीं करती,
तो वह सभ्यता नहीं,
बस एक
अत्याधुनिक जंगल है—
टाई, सूट और एसी के साथ।

कम से कम
असली जंगल में
प्रकृति झूठ नहीं बोलती।

यह पतन कब शुरू हुआ?
उस दिन—
जब हमने
स्व-शिक्षा को
कोने में बैठा दिया।
जब स्पष्टता,
जागरूकता,
और जीवन-उद्देश्य
“वैकल्पिक विषय” बन गए।

जो शिक्षा
मुक्ति सिखाने आई थी,
वह अब
प्रतिस्पर्धा रटवाती है।
जो चेतना जगाने आई थी,
वह अब
महत्वाकांक्षा ट्रेन करती है।
और इसी
खामोश बदलाव में
शिक्षा की आत्मा
कक्षा से बाहर चली गई।

सच्ची शिक्षा पूछती है—
सिर्फ़ यह नहीं
कि जीविका कैसे कमाओ,
बल्कि यह
कि सही ढंग से
जियो कैसे।

सिर्फ़ यह नहीं
कि बाहर कैसे जीतोगे,
बल्कि यह
कि भीतर कैसे जागोगे।

सिर्फ़ यह नहीं
कि जमा क्या करोगे,
बल्कि यह
कि समझ क्या पाओगे।

सिर्फ़ यह नहीं
कि नंबर वन कौन है,
बल्कि यह
कि स्वतंत्र कौन है।

वरना याद रखो—
जब शिक्षा आत्मा भूल जाती है,
तो सभ्यता
टाई में बँधा
एक जंगल बन जाती है।
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