एक विशाल रसोई — जिसका नाम जीवन है
छोटी-छोटी बातें—
कैसे जीवन की विशालता
खा जाती हैं।
आँख में पड़ा
धूल का कण
सूरज को भी
ढक देता है।
पकाना,
पकाना,
पकाना।
साफ़ करना,
साफ़ करना,
साफ़ करना।
धोना,
धोना,
धोना।
क्या सचमुच
इसी के लिए
तुम पैदा हुई थीं?
तीन बच्चे—
एक को जूते चाहिए,
एक को अंडरवियर,
पति को थर्मल।
क्या यही
तुम्हारे अस्तित्व का
महान उद्देश्य है?
छोटे के लिए चप्पल,
बड़े के लिए बनियान,
घर के पुरुष के लिए
स्वेटर।
क्या यही
तुम्हारी नियति है?
अगर जीवन का आधा हिस्सा
सिर्फ़ भोजन पकाने में
गल जाए,
तो अर्थ कहाँ है?
नरक और क्या है
सिवाय एक विशाल रसोई के—
जहाँ सब
हमेशा काटते,
चलाते,
खिलाते रहते हैं?
ऐसी जगह
जहाँ हर व्यक्ति
सिर्फ़ पेट बन जाता है,
और हर वस्तु
खपत के लिए होती है।
मैं भोजन का अपमान नहीं करता।
हाँ,
खाना ज़रूरी है।
पर तुम यहाँ
सिर्फ़ पकाने और खाने
के लिए नहीं आईं।
जीवन
सीखने का अवसर है,
खुद को ललकारने का,
पुराने स्वयं को
पीछे छोड़ने का,
सौंदर्य में
बढ़ने का।
फिर इस पवित्र अवसर को
बर्तनों की रगड़ में
क्यों घिस देना?
क्या बाहर
पूरी दुनिया नहीं?
साहित्य का महासागर
जिसमें डूबा जा सके?
मानसिक और शारीरिक
दीवारें
जो तोड़ी जा सकती हैं?
युद्ध
जो लड़ने योग्य हैं?
अगर रसोई
तुम्हारे जीवन का
केंद्र बनी रही,
तो यह सब
कब होगा?
समय ही जीवन है।
और यदि
तुम मुक्ति से प्रेम करती हो,
तो समय से भी करोगी।
क्योंकि
स्वतंत्रता की ओर
तुम्हारी
एकमात्र मुद्रा
समय ही है।





