पवित्र स्वार्थ

पवित्र स्वार्थ

सही के पक्ष में
डटे रहना आसान नहीं होता—
ख़ासकर तब
जब अपना ही मन
अपने ख़िलाफ़ विद्रोह कर दे।

हम भीतर जो अव्यवस्था ढोते हैं
वह आज की नहीं है।
वह हमारे जन्म से पुरानी है,
हमारी सोच से गहरी,
हमारी परवरिश से भी पहले की।
डर, लालच, ईर्ष्या, आसक्ति—
ये निजी कमज़ोरियाँ नहीं,
विकास की विरासत हैं,
हर जीव को मिली हुई
अंधेरी विरासत।

जब हम तय करते हैं
कि अब ऊपर उठेंगे,
इन आदिम ताक़तों को ललकारेंगे—
तो भ्रम मत पालना,
यह कोई पिकनिक नहीं है।
यह युद्ध की घोषणा है।

स्वयं को बढ़ना पसंद नहीं।
वह फुसफुसाता है—
“बढ़ो, लेकिन बाहर-बाहर।
और पैसा हो,
और रुतबा हो,
और सुविधाएँ हों।
पर भीतर?
वहीं के वहीं रहो—
डरे हुए,
असुरक्षित,
छोटे।”

यही अहंकार का घोषणा-पत्र है।

पर असली विकास
अंदर होता है।
और अंदर का विकास
कभी आरामदेह नहीं होता।
यह अंधी दौड़ नहीं माँगता,
यह माँगता है
जागरूक तपिश।

इसी को
ऋषियों ने तपस्या कहा—
तप—
जलना।
हम स्वयं आग में उतरते हैं,
ताकि भीतर का झूठ
भस्म हो सके।

स्वाभाविक है—
पुरानी आदतें विद्रोह करेंगी,
संस्कार चीख़ेंगे,
थकान आएगी,
संदेह उठेगा।
और हमें सहना होगा।
भागना नहीं होगा।

क्योंकि
आंतरिक विकास
कामों की सूची में
एक काम नहीं है।
वह अकेला काम है।
जब यह सध जाता है,
तो बाकी सब
अपने-आप
किसी अनजानी कृपा से
ठीक होने लगता है।

आख़िर हम
खुद ही तो हैं।
और जो कुछ भी हम चाहते हैं
वह अपने ही कल्याण के लिए है।
इससे बड़ा विषय
और क्या होगा?

यह सुनकर
कोई कह सकता है—
“यह तो स्वार्थ है।”
हाँ।
पर वही कहेगा
जिसने स्वयं को
कभी गहराई से देखा नहीं।

ध्यान से देखो—
शुद्ध स्वार्थ
कोई दोष नहीं।
वह पवित्र है।
वही
हर सच्चे परिवर्तन
की शुरुआत है।
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