चुनाव
सारी असहायता
और दोषारोपण
एक अभिनय है।
सबसे कमज़ोर क्षण में भी
हम इतने सक्षम होते हैं
कि चुनाव कर सकें।
और यही वह शक्ति है
जो हमें दिल के सबसे पास
रखना चाहिए।
कोई भी स्थिति
इतनी अँधेरी नहीं होती कि
सही चुनाव से हमें
छूट मिल जाए।
और कोई भी स्थिति
इतनी उजली नहीं होती कि
सही चुनाव
अनावश्यक हो जाए।
सुख हो या दुःख,
स्पष्टता हो या भ्रम,
धूप हो या तूफ़ान—
दुनिया अपना काम करती है।
पर हमें निर्णय करना होता है।
दो कैदी —एक ही जेल,
एक ही सलाखें, एक ही पहरा।
पर विचार अलग-अलग
पहला बोला—
“मैं बंद हूँ इसलिए कड़वा हूँ।”
दूसरा बोला—
“मैं बंद हूँ, इसलिए सजग हूँ।”
सालों बाद दरवाज़ा खुला।
पहला बाहर आया
नफरत को साथ ले गया।
और दूसरा चेतना को।
सलाखें
दोनों के लिए
एक जैसी थीं।
जीवन वह नहीं है
जो हमारे साथ घटता है।
जीवन वह है जो हम
उसके जवाब में चुनते हैं ।
और हमारा उत्तर ही
असल में हमारे साथ घटता है।
बाक़ी सब तो क्षणिक छवियाँ हैं।
हम कमज़ोर नहीं हैं ।
हमारे भीतर
एक भयावह शक्ति है—
भयानक भी और भव्य भी।
बुरे समय में भी हम
सबसे सही चुन सकते हैं ।
और सबसे अच्छे हालात में भी गलत।
यही मनुष्य होने की
महिमा है—
और यही उसका भय।
इसका अर्थ यह भी है—
स्थिति कभी दोषी नहीं होती।
मनीभाई नवरत्न
