सूखती झीलें, रोता पर्यावरण
अतुकान्त कविता

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झीलें
पहले आकाश को
अपनी सतह पर उतारती थीं,
अब
दरारों में बँटी हुई
सूखी हथेलियों सी फैली हैं।
कभी यहाँ
कमल खुलते थे
सुबह की पहली किरण के साथ,
अब धूल बैठती है
उन पंखुड़ियों की स्मृति पर।
पानी घटता है
तो सिर्फ जल नहीं जाता,
जाता है—
मछलियों का घर,
पक्षियों का विश्राम,
गाँवों की प्यास का भरोसा।
सूखती झीलें
धरती की आँखों में
जमा हुआ नमक हैं।
शहर बढ़ते हैं
और जल सिकुड़ता है,
कंक्रीट की परतों के नीचे
दब जाती है
प्रकृति की धीमी धड़कन।
पर्यावरण रोता है
किसी शोर से नहीं,
बल्कि उस मौन से
जो खाली घाटों पर
गूँजता रहता है।
यह रोना
सुनाई नहीं देता
जब तक
हमारी अपनी प्यास
हमें न जगा दे।
झीलें बचेंगी
तो बादल लौटेंगे,
बादल लौटेंगे
तो जीवन बहेगा।
सूखती झीलों को
फिर से जल देना
सिर्फ संरक्षण नहीं—
भविष्य को
एक और अवसर देना है।

