विश्व सामाजिक न्याय दिवस – समानता की तलाश
(अतुकान्त कविता)
कैलेंडर में
एक तारीख है—
पर ज़मीन पर
अभी भी
कई सवाल पड़े हैं।
किसी के हिस्से
पूरा आकाश,
किसी के हिस्से
सिर्फ़
झुकी हुई निगाहें।
कानून बराबर है,
कहते हैं सब—
पर न्याय की कुर्सी तक
पहुँचने का रास्ता
सबके लिए
एक-सा नहीं।
जाति, रंग, लिंग, भाषा—
ये पहचान नहीं,
ये दीवारें हैं
जो इंसान को
इंसान से
छोटा-बड़ा बनाती हैं।
समानता की तलाश
भीख नहीं माँगती,
वह अधिकार है—
जो सम्मान से
जीने की
पहली शर्त है।
विश्व सामाजिक न्याय दिवस
सिर्फ़ याद दिलाता है—
कि जब तक
सबकी भूख, शिक्षा और अवसर
एक पंक्ति में नहीं खड़े होंगे,
तब तक
न्याय केवल
किताबों में जीवित रहेगा।
