विश्व सामाजिक न्याय दिवस — समाज का सच
(अतुकान्त कविता)
आज दिवस है न्याय का,
पर न्याय आज भी
तारीख़ों में बंद है।
कहीं पेट खाली है,
कहीं थाल भरे हैं,
कहीं मेहनत सस्ती है,
कहीं मुनाफ़ा महँगा।
क़ानून की किताब
सबके लिए समान है,
पर उसकी भाषा
सब नहीं समझ पाते।
कोई नाम से पहचाना जाता है,
कोई जाति से,
कोई मेहनत से,
और कोई सिर्फ़
अपने भाग्य से।
बोलने का हक़ सबको है,
पर सुनने वाला
हर बार ताक़त देखता है।
विश्व सामाजिक न्याय दिवस
एक सवाल है—
क्या न्याय दिवसों में सिमटा रहेगा,
या कभी
समाज का स्वभाव बनेगा?




