KAVITA BAHAR
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आ रहा है बसंत

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आ रहा है बसंत


बड़ा चंचल और चालाक ,
दबे पांव चला आ रहा है बसंत ।
मानो हमें पता ही नहीं ।
उसे क्या पता उसकी प्रभा बिखर गई है।
यह पौधों की नई कलियां
फूलों का खिलना ।
चारों और हरियाली ने हमें सूचित कर दिया है ।
चुपके से आ रहा है बसंत

पर वह भी चतुरंगणी सेना के साथ।
उसकी हरियाली रूपी दहाड़ सुनती है ,
कैसे निहारुं ऋतुराज बसंत को।
मन को आनंदित और उल्लास से भरता है
यह तो ऋतुराज बसंत है।
मन प्रफुल्लित और उत्साहित है
मन गदगद और उल्लास से भरा है।

रामसिंह पंकज(17 वर्ष) ,
गांव चक 2 nwd,,रामपुरा मेटोंरिया।
हनुमानगढ़ ,राजस्थान