विदाई के पल पर कविता

विदाई के पल पर कविता

वर्षों से जुड़े हुए कुछ पत्ते
आज बसंत में टूट रहे हैं ।
जरूरत ही जिनकी पेड़ में
फिर भी नाता छूट रहे हैं।

यह पत्ते होते तो बनती पेड़ की ताकत ।
इन की छाया में मिलती सबको राहत ।
पर सबको मंजिल तक जाना है।
सबने बनाई है अपनी-अपनी चाहत ।
इन की विदाई से डाल-डाल सुख रहे हैं।
जरूरत थी जिनकी पेड़ में
फिर भी नाता छूट रहे हैं ।

इन पत्तों से ही पेड़ में होती जान ।
आखिर पत्तों से ही पेड़ को मिलती पहचान।
यह पत्ते ही भोजन पानी हवा दिला कर ।
बनते हैं जग में महान ।
इनके बिना पेड़ के दम घुट रहे हैं ।
जरूरत थी जिनकी पेड़ में
फिर भी नाता छुट  रहे हैं ।

मानो तो जीवन की यही परिभाषा ।
हर निराशा में छुपी रहती आशा ।
इनके जगह लेने कोई तो आएगा ।
यही भरोसा और यही दिलासा।
पतझड़ के बाद नई कोपले फूट रहे हैं ।

बरसों से जुड़े हुए पत्ते
आज बसंत में टूट रहे हैं।
जरूरत थी जिनकी पेड़ में
फिर भी नाता छूट रहे हैं।

मनीभाई ‘नवरत्न’, छत्तीसगढ़

मनीभाई नवरत्न
मनीभाई नवरत्न

📝 कवि परिचय

यह काव्य रचना छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना ब्लाक क्षेत्र के मनीभाई नवरत्न द्वारा रचित है। अभी आप कई ब्लॉग पर लेखन कर रहे हैं। आप कविता बहार के संस्थापक और संचालक भी है । अभी आप कविता बहार पब्लिकेशन में संपादन और पृष्ठीय साजसज्जा का दायित्व भी निभा रहे हैं । हाइकु मञ्जूषा, हाइकु की सुगंध ,छत्तीसगढ़ सम्पूर्ण दर्शन , चारू चिन्मय चोका आदि पुस्तकों में रचना प्रकाशित हो चुकी हैं।

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