विश्व आर्द्रभूमि दिवस (World Wetlands Day) पर अतुकान्त कविता
📝 अतुकान्त कविता
जल
सिर्फ बहता नहीं,
वह स्मृतियों को भी साथ लेकर चलता है।
धरती की धड़कनों में
आर्द्रभूमि की नमी है—
जहाँ मिट्टी, जल और आकाश
एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े हैं।
यहीं जन्म लेती है हरियाली,
यहीं उतरते हैं प्रवासी पंछी
थके पंखों को विश्राम देने।
आर्द्रभूमि—
न कोई शोर,
न कोई दावा,
फिर भी जीवन का सबसे शांत उत्सव।
काई से ढकी सतह के नीचे
अनगिनत जीवों की सांसें चलती हैं,
कमल की पंखुड़ियों पर
भविष्य की धूप ठहरती है।
जब हम
इन नम धरातलों को
सूखी ज़मीन में बदल देते हैं,
तो केवल पानी नहीं खोते—
हम अपनी आने वाली पीढ़ियों का
एक सुरक्षित कल भी खो देते हैं।
जलवायु की बेचैनी में
आर्द्रभूमियाँ
धरती का धैर्य हैं,
प्रकृति की बची हुई प्रार्थना।
विश्व आर्द्रभूमि दिवस
स्मरण है—
कि जल को बचाना
सिर्फ संसाधन बचाना नहीं,
जीवन और भविष्य को
एक साथ थामे रखना है।
जल है तो
सिर्फ आज नहीं,
कल भी संभव है।

