अंतरतम पीड़ा जागी

अंतरतम पीड़ा जागी

खोया स्वत्व दिवा ने अपना
अंतरतम पीड़ा जागी
घूँघट हैं छुपाये तब तब ही
धडकन में व्रीडा जागी ।


अधर कपोल अबीर भरे से
सस्मित हास् लुटाती सी
सतरंगी सी चुनर ओढ़े
द्वन्द विरोध मिटाती सी
थाम हाथ  साजन के कर में
सकुचाती अलबेली सी
सिहर ठिठक जब पॉव बढ़ा
तो ठाड़ी रही नवेली सी


आई मन मे छायी तन में
सकुच ठिठक सब बंध गए
हुआ गगन स्वर्णिम आरक्तिक
खग कलरव निर्द्वन्द गए
चपल चमक चपला सी मन मे
मेरे मन को रोक लिया
कैसे करूँ अभिसार सखी मैं
उसने मुझको टोक दिया ।


सुशीला जोशी
मुजफ्फरनगर

इस रचना को शेयर करें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top