बसंत आता है
धीरे से…
जैसे किसी ने
ठिठुरी हुई धरती के कंधे पर
पीला दुपट्टा रख दिया हो।
सूखी डालियों में
हरियाली की फुसफुसाहट होती है,
और बंद कलियाँ
अपनी नींद से जागने लगती हैं।
बसंत केवल ऋतु नहीं,
एक संकेत है—
कि जड़ता के बाद
जागरण संभव है।
वह कहता है—
बदलाव अचानक नहीं आता,
वह भीतर ही भीतर
बीज की तरह पनपता है,
मिट्टी के अँधेरे में
साहस जुटाता है,
फिर एक दिन
धूप से आँख मिलाता है।
बसंत सिखाता है—
पत्ते झरना अंत नहीं,
नई कोपलों का प्रारंभ है।
ठंडी हवाएँ स्थायी नहीं,
उष्मा लौटती है।
मनुष्य भी तो
एक वृक्ष ही है—
कभी निराशा की सर्दी में
सूना खड़ा,
कभी आशा की ऋतु में
फूलों से भरा।
बदलाव का बसंत
जब भीतर उतरता है,
तो सोच की बर्फ पिघलती है,
डर की शाखें टूटती हैं,
और विश्वास की नई पत्तियाँ
जन्म लेती हैं।
बसंत हमें याद दिलाता है—
प्रकृति स्थिर नहीं,
जीवन स्थिर नहीं,
तो हम क्यों ठहर जाएँ?
हर पीड़ा के बाद
एक संभावना है,
हर अंत के भीतर
एक आरंभ छिपा है।
बसंत और बदलाव
दोनों साथ चलते हैं—
एक बाहर खिलता है,
दूसरा भीतर।
और जब दोनों मिलते हैं,
तो जीवन
सिर्फ गुजरता नहीं,
महकता है।


