बेटी कली है फूल है बहार है

बेटी कली है फूल है बहार है

बेटी, बेटी कली है, फूल है, बहार है,
बेटी, बेटी गीत है, संगीत है, सुरों की तार है,
बेटी, बेटी धन है, ताकत है, साहस का भंडार है,
बेटी, बेटी घर की जन्नत, स्वर्ग का द्वार है।

बेटी, बेटी पिता की लाडली, माँ की ममता अपार है,
बेटी, बेटी प्यारी – प्यारी बहना, भाई का प्यार है,
बेटी, बेटी आँगन की शोभा, रिश्तों की आधार है,
बेटी, बेटी है तो धरती है, आकाश है, संसार है।

बेटी, बेटी सीता है, सावित्री है, अहिल्याबाई है,
बेटी, बेटी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई है,
बेटी, बेटी राधा है, रुक्मणि है, मीरा बाई है,
बेटी, बेटी उर्मिला है,सबरी है,चांडाल भी कहलाई है।

बेटी, बेटी दुर्गा है, पार्वती है, काली का रूप है,
बेटी, बेटी अबला नहीं सबला है, प्रचंडा स्वरूप है,
बेटी, बेटी दीपक है, रोशनी है, उजाला है,
बेटी, बेटी खुशबू है, सौभाग्य है, चन्दन का प्याला है।

बेटी, बेटी सुरों की मल्लिका लता है, अनुराधा है,
बेटी, बेटी अंतरिक्ष यात्री कल्पना है, सुनीता है,
बेटी, बेटी इंदिरा है, सरोजनी है, देश की शान है,
बेटी, बेटी गौरव है, गाथा है, अभिमान है।

बेटी, बेटी प्यार है, करुणा है, त्याग की मूरत है,
बेटी , बेटी पूजा है, आरती है, गीता की सूरत है,
बेटी, बेटी ज्वाला है, लक्ष्मी है, सरस्वती आकार है,
बेटी, बेटी बेटी ही नहीं, ईश्वरीय शक्ति का अवतार है।

बलबीर सिंह वर्मा “वागीश”
सिरसा (हरियाणा)

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