हिंदी कविता

यह दीप अकेला / अज्ञेय

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यह दीप अकेला / अज्ञेय यह दीप अकेला स्नेह भराहै गर्व भरा मदमाता परइसको भी पंक्ति को दे दो यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगापनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लायेगा?यह समिधा : ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगायह अद्वितीय : यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित : यह दीप अकेला स्नेह भराहै गर्व […]

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ऊँचाई / अटल बिहारी वाजपेयी

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ऊँचाई / अटल बिहारी वाजपेयी ऊँचे पहाड़ पर,पेड़ नहीं लगते,पौधे नहीं उगते,न घास ही जमती है। जमती है सिर्फ बर्फ,जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,मौत की तरह ठंडी होती है।खेलती, खिलखिलाती नदी,जिसका रूप धारण कर,अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है। ऐसी ऊँचाई,जिसका परसपानी को पत्थर कर दे,ऐसी ऊँचाईजिसका दरस हीन भाव भर दे,अभिनंदन की अधिकारी

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झुक नहीं सकते / अटल बिहारी वाजपेयी

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झुक नहीं सकते / अटल बिहारी वाजपेयी टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते सत्य का संघर्ष सत्ता सेन्याय लड़ता निरंकुशता सेअंधेरे ने दी चुनौती हैकिरण अंतिम अस्त होती है दीप निष्ठा का लिये निष्कंपवज्र टूटे या उठे भूकंपयह बराबर का नहीं है युद्धहम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्धहर तरह के शस्त्र से है सज्जऔर

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भारत जमीन का टुकड़ा नहीं / अटल बिहारी वाजपेयी

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भारत जमीन का टुकड़ा नहीं / अटल बिहारी वाजपेयी भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,यह तर्पण की भूमि है,

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आओ फिर से दिया जलाएँ / अटल बिहारी वाजपेयी

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आओ फिर से दिया जलाएँ / अटल बिहारी वाजपेयी आओ फिर से दिया जलाएँभरी दुपहरी में अँधियारासूरज परछाई से हाराअंतरतम का नेह निचोड़ें-बुझी हुई बाती सुलगाएँ।आओ फिर से दिया जलाएँ हम पड़ाव को समझे मंज़िललक्ष्य हुआ आँखों से ओझलवर्त्तमान के मोहजाल में-आने वाला कल न भुलाएँ।आओ फिर से दिया जलाएँ। आहुति बाकी यज्ञ अधूराअपनों के

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मौत से ठन गई / अटल बिहारी वाजपेयी

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मौत से ठन गई / अटल बिहारी वाजपेयी ठन गई!मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था,मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। मैं जी भर

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दूध में दरार पड़ गई / अटल बिहारी वाजपेयी

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दूध में दरार पड़ गई / अटल बिहारी वाजपेयी ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?भेद में अभेद खो गया।बँट गये शहीद, गीत कट गए,कलेजे में कटार दड़ गई।दूध में दरार पड़ गई। खेतों में बारूदी गंध,टूट गये नानक के छंदसतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।वसंत से बहार झड़ गईदूध में दरार पड़ गई। अपनी ही

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कौरव कौन कौन पांडव / अटल बिहारी वाजपेयी

हिंदी कविता

कौरव कौन कौन पांडव / अटल बिहारी वाजपेयी कौरव कौनकौन पांडव,टेढ़ा सवाल है|दोनों ओर शकुनिका फैलाकूटजाल है|धर्मराज ने छोड़ी नहींजुए की लत है|हर पंचायत मेंपांचालीअपमानित है|बिना कृष्ण केआजमहाभारत होना है,कोई राजा बने,रंक को तो रोना है| कौरव कौन, कौन पांडव / अटल बिहारी वाजपेयी

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पंद्रह अगस्त की पुकार / अटल बिहारी वाजपेयी

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पंद्रह अगस्त की पुकार / अटल बिहारी वाजपेयी पंद्रह अगस्त का दिन कहता:आज़ादी अभी अधूरी है।सपने सच होने बाकी है,रावी की शपथ न पूरी है॥ जिनकी लाशों पर पग धर करआज़ादी भारत में आई,वे अब तक हैं खानाबदोशग़म की काली बदली छाई॥ कलकत्ते के फुटपाथों परजो आँधी-पानी सहते हैं।उनसे पूछो, पंद्रह अगस्त केबारे में क्या

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हरी हरी दूब पर / अटल बिहारी वाजपेयी

हिंदी कविता

हरी हरी दूब पर / अटल बिहारी वाजपेयी हरी हरी दूब परओस की बूंदेअभी थी,अभी नहीं हैं|ऐसी खुशियाँजो हमेशा हमारा साथ देंकभी नहीं थी,कहीं नहीं हैं| क्काँयर की कोख सेफूटा बाल सूर्य,जब पूरब की गोद मेंपाँव फैलाने लगा,तो मेरी बगीची कापत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँया उसके ताप से भाप बनी,ओस की बुँदों

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क़दम मिला कर चलना होगा / अटल बिहारी वाजपेयी

हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविता

क़दम मिला कर चलना होगा / अटल बिहारी वाजपेयी बाधाएँ आती हैं आएँघिरें प्रलय की घोर घटाएँ,पावों के नीचे अंगारे,सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,निज हाथों में हँसते-हँसते,आग लगाकर जलना होगा।क़दम मिलाकर चलना होगा। हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,अगर असंख्यक बलिदानों में,उद्यानों में, वीरानों में,अपमानों में, सम्मानों में,उन्नत मस्तक, उभरा सीना,पीड़ाओं में पलना होगा।क़दम मिलाकर चलना होगा।

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नाप-तोल

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देखा है वो वक़्त ज्ञानी, रुक जाती है जुबानी।सिल जाते होंठ जहाँ, स्वयं नाप-तोल में।। रूह से ये मन बोले, आंखों में ना आंखें डोले।सुनने है शब्द सांझे, बेचैनी माहौल में।। तेवर की तीव्र होली, अंगारो जैसी रंगोली।घुल गई धुँआ भी तो, स्नेह के घोल में।। अभिमानी गई जानी, सब मस्त दाना-पानी।सीख मैंने सीख लई,

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