मज़ाक के सिवा कुछ स्थायी नहीं
हास्य और व्यंग्य, हिंदी कवितामज़ाक के सिवा कुछ स्थायी नहीं(Nothing Lasts but the Joke) किसी को“परे”,“अटल”,“सदैव”का दर्जा मत दो। यहाँकुछ भीअविनाशी नहीं। दिखाओ मुझे—जो आज जैसा हैवैसा हीकल भी रहे। दिखाओ मुझे—जो तुम्हारी उम्मीदों सेकभी विश्वासघात न करे। बुद्धिमान जानता है—स्थितियाँ खेल हैं।आज यह,कल कुछ और। वे किसी की नहीं होतीं।न वफ़ादार,न प्रतिबद्ध।क्षणिक—जुगनू की रोशनी जैसी। ध्यान से देखो—जो
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