Mr. Hormones Again!
(अतुकांत हिंदी कविता – भावानुवाद)
जिसे आम तौर पर
प्रेम कहा जाता है,
वह अक्सर
कविता नहीं होता—
वह
हार्मोनों का
धमाका होता है
जो
रोमांस का
वेश पहन लेता है।
प्रेम
उसी क्षण
खो जाता है
जब तुम
रसायन को
ईश्वर समझ लेते हो।
क्या तुमने कभी
किसी को
ईमानदारी से कहते देखा है—
“तुम्हें देखकर
मेरे हार्मोन
बेहद सक्रिय हो जाते हैं”?
नहीं।
कोई ऐसा नहीं कहता।
अधिकतर
खुद को भी
पता नहीं होता।
वे बस कहते हैं—
“डार्लिंग,
मुझे तुमसे प्यार हो गया है।”
क्या तुमने
किसी छह साल के बच्चे को
पागलों की तरह
प्रेम में पड़ते देखा है?
फिर यह तथाकथित “प्रेम”
अक्सर
सोलह की उम्र में ही
क्यों फूट पड़ता है?
समझो—
यह प्रेम नहीं,
कच्ची रसायनिकी है।
एक रासायनिक मिश्रण
दूसरे रासायनिक मिश्रण से
मिलने को बेचैन—
पुरुष-रसायन,
स्त्री-रसायन,
और फिर—
धमाका।
सुनने में
जितना हास्यास्पद है,
हकीकत भी
उतनी ही है।
पर तुम
यहीं नहीं रुकते।
तुम इसे
गंभीर बना देते हो।
गीत लिखते हो,
आँसू बहाते हो,
इसे
दिल टूटना कहते हो,
इसे
क़िस्मत कहते हो।
अगली बार
जब कोई
“प्रेम प्रस्ताव” रखे,
तो मन ही मन कहना—
“ओहो हो,
मिस्टर हार्मोन्स!”
और याद रखना—
हार्मोन
खुद को
हार्मोन कहकर
कभी पेश नहीं करते।
वे
सच्चाई का मुखौटा पहनते हैं,
तड़प बनकर आते हैं,
गहरे जुड़ाव की
अदाकारी करते हैं।
पर
मुखौटा उतारो—
तो वही
पुरानी
जैविक चाह
मिलेगी,
बस
थोड़ी बेहतर
वेशभूषा में।
जिसे दुनिया
सच्चा प्रेम कहती है,
उसका बड़ा हिस्सा
असल में
जैव-रासायनिक उन्माद है—
जो
भावनाओं
और आत्मिक शब्दों
की आड़ में
छिपा रहता है।





