यह तुम्हारी नियति नहीं है!
तुम
कुछ बनने नहीं आए हो।
तुम
कुछ याद करने आए हो।
जिसे तुम
खोज रहे हो—
वह
कभी खोया ही नहीं।
खोजने वाला
झूठा है।
जिसे खोजना है,
वह
पहले से
मौजूद है।
अपनी
मूल सत्ता को
मत भूलो—
वह
तुम्हारे
आज के अनुभवों से
कहीं आगे है।
तुम
असीम हो।
अपरिमेय।
भले ही
तुम्हारे
खाने,
सोचने,
जीने के ढंग में
इसका
कोई प्रमाण न दिखे।
आदतें
इसे नहीं दिखातीं।
चुनाव
इसे व्यक्त नहीं करते।
फिर भी
यह सच है—
अछूता।
अक्षुण्ण।
हम
लाचार होने की
आदत में जीते हैं।
अपनी ज़िंदगी देखो—
और
मुक्त होने की बात
हास्यास्पद लगती है।
पर
स्वतंत्रता
तुम्हारा
स्वभाव है।
इसलिए
तुम
कठपुतली नहीं हो।
यदि
तुम किसी बंधन में हो—
व्यवस्था,
रिश्ते,
भावनाएँ—
तो
वह
तुम्हारी
मौन सहमति से है।
और
जब तक
तुम
इस सहमति को
स्वीकार नहीं करते,
तब तक
अपनी शक्ति
याद नहीं कर सकते।
तुम
दोष देते रहोगे।
तर्क गढ़ते रहोगे।
और
अपने ही स्रोत से
कटे रहोगे।
यदि
तुम बार-बार
कहते हो—
मैं संघर्ष में हूँ,
मैं हारा हुआ हूँ,
मुझ पर थोपा गया है—
तो
यही विश्वास
तुम्हारी
झूठी नियति
बन जाएगा।
डर में लिखी गई
कहानी
तुम
खुद जीने लगोगे।
और
भूल जाओगे—
कि तुम
हमेशा से
मुक्त थे।
याद करना—
यही
पहला कदम है।
और
स्मरण ही
पुनः प्राप्ति है।
यह तुम्हारी नियति नहीं है।
यह केवल
भूल है।





