हिंदी कविता

एक दिन में अनंत समय है

समय और जीवन दर्शन, हिंदी कविता

एक दिन में अनंत समय है जो जानता हैकि घड़ी चल रही है,वहक्षण कोखाली लौटने नहीं देता। जीवन का सम्मानसमय के सम्मान सेशुरू होता है। तुम कहते हो—एक दिन मेंसिर्फ़ चौबीस घंटे होते हैं। पर यहसिर्फ़तुम्हारी परिभाषा है। ज़रा रुको।गिनती बदलो। एक दिन मेंकितने मिनट होते हैं?देखो—समयअचानकफैलने लगा। अबसेकंड गिनो।समयऔर फैल गया। और एक सेकंड?उसमेंअरबों

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Mr. Hormones Again!

हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविता

Mr. Hormones Again!(अतुकांत हिंदी कविता – भावानुवाद) जिसे आम तौर परप्रेम कहा जाता है,वह अक्सरकविता नहीं होता—वहहार्मोनों काधमाका होता हैजोरोमांस कावेश पहन लेता है। प्रेमउसी क्षणखो जाता हैजब तुमरसायन कोईश्वर समझ लेते हो। क्या तुमने कभीकिसी कोईमानदारी से कहते देखा है—“तुम्हें देखकरमेरे हार्मोनबेहद सक्रिय हो जाते हैं”? नहीं।कोई ऐसा नहीं कहता।अधिकतरखुद को भीपता नहीं होता।

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तुम आलसी नहीं हो, तुम प्रेमहीन हो

प्रेम और रिश्ते, हिंदी कविता

तुम आलसी नहीं हो, तुम प्रेमहीन हो आलस्यऊर्जा की कमी नहीं है।यहसमझ की कमी है। तुम अपने भीतर कीभूमि को नहीं जानते—इसलिएयह भी नहीं जानतेकि कौन-सा कर्मतुम्हें जीवित करेगा,कौन-सा प्रयाससचमुच फल देगा। कर्मऊर्जा माँगता है।और जबउस ऊर्जा कालाभ स्पष्ट न हो,तोमनक्रिया के बजायनिष्क्रियता चुन लेता है। यहीआलस्य कहलाता है। यदि तुमनेकभीसही कर्म कीमिठास चखी होती—उस

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लगाव आज़माया? अब प्रेम आज़माओ

विरह और दर्द, हिंदी कविता

लगाव आज़माया? अब प्रेम आज़माओ किसी कमरे मेंकाफी देर रह लो,तो कमराअपना लगने लगता है। कमीज़ पहनोकुछ समय तक,गाड़ी चलाओबरसों—औरपहचानजुड़ जाती है। ताँबा और जस्तासाथ पड़े रहें,तोआपस मेंघुलने लगते हैं। क्याइसेप्रेम कहोगे? लगावअच्छा लगता है,सुकून-सा देता है।परज़रा शांति सेदेखो— उसके साथडर आता है,हिंसा आती है,लालच,भ्रम,ऊब,अकेलापन,शक—सबएक साथ। लगावप्रेम जैसालगता है,परक्या वहहमेशाअपने बारे मेंनहीं होता? जहाँमैं केंद्र

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भय कभी भय बनकर नहीं आता

हिंदी कविता

भय कभी भय बनकर नहीं आता तुम सोचते होदुनिया बाँध रही है तुम्हें।पर सच यह है—डोरियाँ तुम्हारे भीतर हैं। भय कभीभय बनकर नहीं आता।वह प्रेम का मुखौटा पहनता है,कर्तव्य कहलाता है,ज़िम्मेदारी बन जाता है,पर भीतर सेकाँपता रहता है। भय है जब कहा जाता है—शादी कर लो,बुढ़ापे में अकेले रह जाओगे।तुम साथ नहीं खोजते,तुम बीमा खरीदते

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व्यक्ति से प्रेम या कल्पना के भूत से?

विरह और दर्द, हिंदी कविता

व्यक्ति से प्रेम या कल्पना के भूत से? हमलोगों से प्रेम नहीं करते,हमअपनी ही कल्पनाओं केभूतों से प्रेम करते हैं—जब तकयथार्थबुलबुले कोफोड़ नहीं देता। देखो—अनुभवहर दिनहमें कैसेछलता है। वह सामने खड़ी है,और तुमकसम खाते हो—दुनिया कीसबसे सुंदर स्त्री है। यहउसका सौंदर्य नहीं,तुम्हारीदृष्टि काभ्रम है। हमआत्म-छल मेंडूबे रहते हैं।यहाँ तक किजब हम सोचते हैंकिसाधारण लोगों कोदेख

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अगला कदम ही पर्याप्त है

हिंदी कविता

अगला कदम ही पर्याप्त है(The Next Step Is Enough) सच्चा कर्ममहत्त्वाकांक्षा से नहीं,स्पष्टता से जन्म लेता है।उसे नक्शों की ज़रूरत नहीं—बसएक सही अगला कदम। हम खुद से धोखा करते हैं।सुविधा पर फिसलते हैं,बहानों में टिक जाते हैं,और मान लेते हैंकि हम बहुत कोशिश कर रहे हैं। सच यह है—हम खुद को पर्याप्त नहीं खींचते।सीमा तक

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प्रेरणा क्यों विफल होती है

प्रेरणा और सकारात्मकता, हिंदी कविता

तुम्हें प्रेरणा नहीं चाहिए,तुम्हें बोध चाहिए।धक्का नहीं,खींच नहीं—भीतर की वह चाबीजो पहले से तुम्हारे पास है। प्रेरणाहमेशा बाहर से आती है—कोई भाषण देता है,मन गरम हो जाता है।कोई फ़िल्म देखी,सीना भर आया।किताब बंद हुई,जोश भी बंद। यह तुम्हारी ऊर्जा नहीं थी,यह उधार थी।और उधार की आगज्यादा देर नहीं जलती। बाहरी शक्तितुम पर काम करती है,तुम

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मनोरंजन नाम की सज़ा

हिंदी कविता

मनोरंजन नाम की सज़ा(The Punishment Called Entertainment) तुम मनोरंजन ढूँढते होक्योंकि भीतरगहरी ऊब है। जो जीवन से भाग रहा है,वही सबसे ज़्यादाहँसता दिखता है।और जो साहस करता है,वह अक्सरचुप और गंभीर। जिसे तुम आनंद कहते हो,वह केवल उत्तेजना है—थोड़ी देर की गुदगुदी।इसे कोई भी दयनीय पा सकता है,और यहीउसकी सज़ा है। यदि तुम्हें लगातार मज़ा

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ईर्ष्या: उधार ली हुई पहचान का दर्द

विरह और दर्द, हिंदी कविता

“ईर्ष्या: उधार ली हुई पहचान का दर्द” ईर्ष्याकिसी और से नहीं होती,ईर्ष्याखुद से होती है—जब खुदउधार का हो। मैं नहीं जानतामैं कौन हूँ,तोतुमसे पूछता हूँ। तुम कहते हो—“तुम बहुत अच्छे हो,”और मैंअच्छा हो जाता हूँ। मेरी पहचानतुम्हारे मुँह मेंलटक जाती है। पर उसी मुँह सेजब तुमकिसी और कीतारीफ़ कर देते हो,तोकुछ भीतर टूट जाता है।

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जाओ, ज़िंदगी जियो”

हिंदी कविता

“एह! जाओ, ज़िंदगी जियो” दुनियाडरावने चेहरे पहनकर आती है,मास्क लगाकर,फुफकारते साँप दिखाकर,ड्रैगन की तरह गुर्राकर—बस तुम्हारी शांति हिलाने के लिए। और तुम?एक आँख खोलते हो,उसे देखते हो—और कहते हो,“एह?” फिर करवट बदलकरसो जाते हो। यही है असली मालिकाना हक़।यही है दुनिया पर राज। जो हर जगहखेल का मैदान ढूँढ लेता है,हर जगहनाचने की जगह बना

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प्लमकेक या सत्य?

विरह और दर्द

प्लमकेक या सत्य? थोड़ा-सा दुख आएतोकोई प्लमकेक पकड़ा देता है।कोई तोहफ़ा,कोई सैर,कोई ध्यान-भटकाव। आँसू सूख जाते हैं—समाधान से नहीं,प्रतिस्थापन से। दुख गया नहीं,बसमन बहला दिया गया। यही हैसभ्य दुख का इलाज—रो लो थोड़ा,फिर मुस्कुरा लो। कई बारदुख इसलिए भी आता हैक्योंकितुम्हें प्लमकेक चाहिए।ध्यान चाहिए।सांत्वना चाहिए। यह दुखपरिवर्तन नहीं करता,यह माँग करता है।यह अहंकार कीएक और

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