हिंदी कविता

तुमने ही चोर को बुलाया

हिंदी कविता

तुमने ही चोर को बुलाया पहले इच्छा ने दरवाज़ा खोला,फिर चोर भीतर आया। जब चाह आग बन जाती है,तो दुनियाव्यापारी बनकर पहुँचती है—मदद के लिए नहीं,मुनाफ़े के लिए। ज़रूरतमंद ग्राहकसबसे आसान शिकार होता है।अधीर हो तुम,तो वादा कुछ भी चलेगा,और मिलेगा—कुछ नहीं। तुमने सुकून माँगा,तुम्हें शोर मिला।तुमने अर्थ चाहा,तुम्हें नक़ली जवाब मिले। फिर तुम बोले—“उन्होंने

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दर्द से नमस्ते कहो

विरह और दर्द, हिंदी कविता

दर्द से नमस्ते कहो दर्द आएगा—यह टाला नहीं जा सकता।पर भ्रम?वे वैकल्पिक हैं। कुछ दर्दसंयोग से आते हैं—बिना अनुमति।उन्हेंउतनी ही जगह दोजितनी ज़रूरी हो। कुछ दर्दतुम चुनते हो—सही बदलाव की कीमत।उसेखुले दिल सेस्वीकार करो। और कुछ दर्दमूर्खता से पैदा होते हैं—गलत निर्णय,बिना देखे उठाए कदम।यह दर्द क्यों ढोना? जीवनलगातार बहता है।देह और मनठहराव चाहते हैं।यहीं

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विचलन नहीं जीतते, कमजोर लक्ष्य हारते हैं

समाज और यथार्थ

विचलन नहीं जीतते, कमजोर लक्ष्य हारते हैं यदि लक्ष्यतुम्हें पकड़ नहीं पाता,तो दुनियातुम्हें खींच लेती है। विचलन दोषी नहीं हैं।वे बस यह बता रहे हैंकि लक्ष्यनिर्जीव है। अगर बार-बारध्यान की याद दिलानी पड़े,तो समझ लो—हृदय वहाँ नहीं है। कमजोर लक्ष्यमन को भटकने कानिमंत्रण देता है।यह समस्या नहीं,लक्षण है। ऐसा लक्ष्य चुनोजो तुम्हारी ढाल बन जाए।तुम

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क़िस्तों में दिया गया दर्द

विरह और दर्द, हिंदी कविता

क़िस्तों में दिया गया दर्द हम सीधेछाती पर चोट नहीं लेते।हम तैयार नहीं होतेएक सच्चे,पूरा चीर देने वालेवार के लिए। इसलिए मनचाल चलता है—एक ही सच कोसौ टुकड़ों मेंतोड़ देता है। घाव रहता है,पर फैल जाता है।टल जाता है।छुप जाता है। अगर पीड़ाएक साथ आती—तीव्र,अस्वीकार्य—तो शायदहमें रुकना पड़ता।देखना पड़ता।सच मानना पड़ता। पर हमनेज़िंदगी ऐसे रची

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न ट्रॉफी, बस खेल

मन और भावनाएँ

न ट्रॉफी, बस खेल (No Trophies, Just Play) जब भीतर पूर्ण हो,तो दुनिया सेसाथ माँगने नहीं जाते। जब भीतर पूर्ण हो,तो दुनिया सेकोई शिकायत भी नहीं रहती। तब कर्म होता है—तेज़, जीवंत,पर फल की भीख के बिना। कहते हैं जीवन कोकोई प्रेरक चाहिए।पर क्या वह प्रेरणाहीनता और कमी की भावना होनी चाहिए? हम जमा करते

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तुम अपने दुख की सहमति देते हो

विरह और दर्द

तुम अपने दुख की सहमति देते हो चुनाव!तुम असहाय नहीं हो।बहाए नहीं जा रहे—तुम चल रहे हो। कुछ भीतुम पर घटित नहीं होताबिना तुम्हारीमौन अनुमति के। दुख आता हैऔर तुमकिसी को ढूँढते हो—दोष देने के लिए।व्यक्ति, परिस्थिति,भाग्य, समय। पर स्वतंत्रताबिना जिम्मेदारीकभी मिली है? जो दुख भोग रहा है,सबसे बड़ा हितउसी का है—उसे समाप्त करने में।

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मुक्त समय का मिथक

समय और जीवन दर्शन

मुक्त समय का मिथक जीवन कोखालीपन नहीं चाहिए,उद्देश्य चाहिए,आग चाहिए। समय को बरबाद करने कासबसे आसान तरीका है—छोटी-छोटी बातों मेंमन को उलझाए रखना,सोचना,घिसटना,और वहीं फँसे रहना। जीवन ही समय है।हर क्षणअमूल्य है। हम जन्म लेते हैंशारीरिक प्रवृत्तियों की बेड़ियों में,और बड़े होते-होतेसमाज सेऔर भी जंजीरें जमा कर लेते हैं। जीवन का अर्थ है—सीख को भी

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झूठ के लिए चमकने से बेहतर है सत्य के लिए लहूलुहान होना

समाज और यथार्थ

झूठ के लिए चमकने से बेहतर है सत्य के लिए लहूलुहान होना हारअसफलता नहीं होती।सबसे बड़ी हार है—यह जानकर भीकि युद्ध योग्य है,पीठ फेर लेना। उत्कृष्ट बनने से पहलेपूछो—किसमें? तेज़ चलने से पहलेपूछो—किस दिशा में? गति बाद में आती है।दिशा पहले। गलत राह पर उड़ने से बेहतर हैसही रास्ते पररेंगना। सही चुनाव करनासही चुनाव मेंपरफेक्ट

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अपने भीतर की शरारत पकड़ना

हिंदी कविता

अपने भीतर की शरारत पकड़ना अपने ही भीतररंगे हाथों पकड़ लेना—इससे बड़ा मज़ाऔर क्या होगा? जब मनबिना पूछेकल्पनाओं में फिसलने लगे,तभी उसे पकड़ो। जब डरधीरे से कंधे परहाथ रखे,या असुरक्षाकान में फुसफुसाए—उसी क्षणरोशनी जला दो। ये सबअँधेरे के जीव हैं,ध्यान की एक किरणपड़ते हीसिकुड़ने लगते हैं। ईर्ष्या,चिंता,बिखरे विचार—इन्हें सुधारो मत,बस देखो। देखते हीइनकी पकड़ढीली पड़

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आत्मविश्वास ही भय है (Confidence Is Fear)

हिंदी कविता

आत्मविश्वास ही भय है (Confidence Is Fear) डर का इलाजआत्मविश्वास नहीं होता।वह केवलडर पर डाला गयाएक मुखौटा है। गोली की तरह—क्षणिक राहत,पर बीमारी जस की तस। डर मिटता नहीं,चुपचाप भीतरऔर गहराता है। निर्भयतासीना तानकर खड़े होने में नहीं,बल्किकिसी के सामनेखड़े होने की ज़रूरत न रहने में है। जब खोने कोकुछ नहीं होता,तो डर किस बात

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अपनी ही जेब से चोरी

समाज और यथार्थ

अपनी ही जेब से चोरी हम चोरी तब पहचानते हैंजब उँगलियाँकिसी और की जेब में जाती हैं। पर जबमैं अपने ही सपनों कोचुपचाप गिरवी रख देता हूँ,जबमैं अपनी ऊँचाई सेखुद ही मुँह मोड़ लेता हूँ—तब कोई शोर नहीं होता। मैं खुद से झूठ बोलता हूँ,फिर उसी झूठ कोसच की तरहओढ़ लेता हूँ। दूसरों को धोखाकुछ

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अपने आप को दूसरा जन्म दो

समाज और यथार्थ

“अपने आप को दूसरा जन्म दो” पहला जन्ममाँ की कोख से होता है—शरीर मिलता है,नाम मिलता है,पर मैं कौन हूँयह नहीं मिलता। बच्चा रोता है,भूख लगती है,डर लगता है—यह प्रकृति सिखाती है। पर बड़ा होकर भीअगर आदमीसिर्फ़भूख, डर और लालच मेंही जीता रहे—तो जन्म अधूरा है। एक उदाहरण देखो—एक बच्चाखिलौना छिनते हीमारने दौड़ पड़ता है।अगर

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