तुमने ही चोर को बुलाया
हिंदी कवितातुमने ही चोर को बुलाया पहले इच्छा ने दरवाज़ा खोला,फिर चोर भीतर आया। जब चाह आग बन जाती है,तो दुनियाव्यापारी बनकर पहुँचती है—मदद के लिए नहीं,मुनाफ़े के लिए। ज़रूरतमंद ग्राहकसबसे आसान शिकार होता है।अधीर हो तुम,तो वादा कुछ भी चलेगा,और मिलेगा—कुछ नहीं। तुमने सुकून माँगा,तुम्हें शोर मिला।तुमने अर्थ चाहा,तुम्हें नक़ली जवाब मिले। फिर तुम बोले—“उन्होंने
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