विरह और दर्द

दर्द से नमस्ते कहो

विरह और दर्द, हिंदी कविता

दर्द से नमस्ते कहो दर्द आएगा—यह टाला नहीं जा सकता।पर भ्रम?वे वैकल्पिक हैं। कुछ दर्दसंयोग से आते हैं—बिना अनुमति।उन्हेंउतनी ही जगह दोजितनी ज़रूरी हो। कुछ दर्दतुम चुनते हो—सही बदलाव की कीमत।उसेखुले दिल सेस्वीकार करो। और कुछ दर्दमूर्खता से पैदा होते हैं—गलत निर्णय,बिना देखे उठाए कदम।यह दर्द क्यों ढोना? जीवनलगातार बहता है।देह और मनठहराव चाहते हैं।यहीं

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क़िस्तों में दिया गया दर्द

विरह और दर्द, हिंदी कविता

क़िस्तों में दिया गया दर्द हम सीधेछाती पर चोट नहीं लेते।हम तैयार नहीं होतेएक सच्चे,पूरा चीर देने वालेवार के लिए। इसलिए मनचाल चलता है—एक ही सच कोसौ टुकड़ों मेंतोड़ देता है। घाव रहता है,पर फैल जाता है।टल जाता है।छुप जाता है। अगर पीड़ाएक साथ आती—तीव्र,अस्वीकार्य—तो शायदहमें रुकना पड़ता।देखना पड़ता।सच मानना पड़ता। पर हमनेज़िंदगी ऐसे रची

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तुम अपने दुख की सहमति देते हो

विरह और दर्द

तुम अपने दुख की सहमति देते हो चुनाव!तुम असहाय नहीं हो।बहाए नहीं जा रहे—तुम चल रहे हो। कुछ भीतुम पर घटित नहीं होताबिना तुम्हारीमौन अनुमति के। दुख आता हैऔर तुमकिसी को ढूँढते हो—दोष देने के लिए।व्यक्ति, परिस्थिति,भाग्य, समय। पर स्वतंत्रताबिना जिम्मेदारीकभी मिली है? जो दुख भोग रहा है,सबसे बड़ा हितउसी का है—उसे समाप्त करने में।

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दर्द में खेलो

विरह और दर्द, हिंदी कविता

दर्द में खेलो दर्द में खेलो।दर्द के साथ खेलो।बसखेलते रहो। दर्द है—हाँ।पर जबकिसी सार्थक चीज़ मेंपूरी तरह डूबे हो,तो क्यादर्द परध्यान बचता है? वहकिनारे चला जाता है।केंद्र नहीं बनता।उद्देश्य कोहाइजैक नहीं करता। एक साधारण खिलाड़ी भीयह जानता है—जीत की दौड़ मेंदर्ददूसरे नंबर पर होता है। जब तकस्ट्रेचर न आए,खेलरुकता नहीं। दोपहर का सूरजआग उगल रहा

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दर्द तब होता है जब कल्पना टूटती है

विरह और दर्द, हिंदी कविता

Hurt Is When Fantasy Breaks(अतुकांत हिंदी कविता – भावानुवाद) चोटअचानक नहीं लगती,वह उसी जगह लगती हैजहाँतुम्हारा लगावसबसे गहरा होता है। अगर दुख है,तो उसेभाग्य या दूसरे पर मत डालो—अपनेआसक्ति को देखो। दर्दकिसी घटना का नाम नहीं,वह उस कहानी का टूटना हैजिसे तुमचुपचापपाले हुए थे। एक तस्वीर थी,एक उम्मीद थी,एक विश्वास था—और यथार्थ नेउसे मानने सेइनकार

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लगाव आज़माया? अब प्रेम आज़माओ

विरह और दर्द, हिंदी कविता

लगाव आज़माया? अब प्रेम आज़माओ किसी कमरे मेंकाफी देर रह लो,तो कमराअपना लगने लगता है। कमीज़ पहनोकुछ समय तक,गाड़ी चलाओबरसों—औरपहचानजुड़ जाती है। ताँबा और जस्तासाथ पड़े रहें,तोआपस मेंघुलने लगते हैं। क्याइसेप्रेम कहोगे? लगावअच्छा लगता है,सुकून-सा देता है।परज़रा शांति सेदेखो— उसके साथडर आता है,हिंसा आती है,लालच,भ्रम,ऊब,अकेलापन,शक—सबएक साथ। लगावप्रेम जैसालगता है,परक्या वहहमेशाअपने बारे मेंनहीं होता? जहाँमैं केंद्र

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व्यक्ति से प्रेम या कल्पना के भूत से?

विरह और दर्द, हिंदी कविता

व्यक्ति से प्रेम या कल्पना के भूत से? हमलोगों से प्रेम नहीं करते,हमअपनी ही कल्पनाओं केभूतों से प्रेम करते हैं—जब तकयथार्थबुलबुले कोफोड़ नहीं देता। देखो—अनुभवहर दिनहमें कैसेछलता है। वह सामने खड़ी है,और तुमकसम खाते हो—दुनिया कीसबसे सुंदर स्त्री है। यहउसका सौंदर्य नहीं,तुम्हारीदृष्टि काभ्रम है। हमआत्म-छल मेंडूबे रहते हैं।यहाँ तक किजब हम सोचते हैंकिसाधारण लोगों कोदेख

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ईर्ष्या: उधार ली हुई पहचान का दर्द

विरह और दर्द, हिंदी कविता

“ईर्ष्या: उधार ली हुई पहचान का दर्द” ईर्ष्याकिसी और से नहीं होती,ईर्ष्याखुद से होती है—जब खुदउधार का हो। मैं नहीं जानतामैं कौन हूँ,तोतुमसे पूछता हूँ। तुम कहते हो—“तुम बहुत अच्छे हो,”और मैंअच्छा हो जाता हूँ। मेरी पहचानतुम्हारे मुँह मेंलटक जाती है। पर उसी मुँह सेजब तुमकिसी और कीतारीफ़ कर देते हो,तोकुछ भीतर टूट जाता है।

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प्लमकेक या सत्य?

विरह और दर्द

प्लमकेक या सत्य? थोड़ा-सा दुख आएतोकोई प्लमकेक पकड़ा देता है।कोई तोहफ़ा,कोई सैर,कोई ध्यान-भटकाव। आँसू सूख जाते हैं—समाधान से नहीं,प्रतिस्थापन से। दुख गया नहीं,बसमन बहला दिया गया। यही हैसभ्य दुख का इलाज—रो लो थोड़ा,फिर मुस्कुरा लो। कई बारदुख इसलिए भी आता हैक्योंकितुम्हें प्लमकेक चाहिए।ध्यान चाहिए।सांत्वना चाहिए। यह दुखपरिवर्तन नहीं करता,यह माँग करता है।यह अहंकार कीएक और

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दर्द के व्यापारी को देख लो/ मनीभाई नवरत्न

विरह और दर्द, हिंदी कविता

दर्द के व्यापारी को देख लो जिसे देखकरतुम अपने दर्द से लड़ते हो,जिसे पाकरतुम थोड़ी देर जी लेने की हिम्मत जुटाते हो—उसी दर्द का सौदागरतुम्हारे सामने मुस्कुरा कर खड़ा है। वह पहलेतुम्हारे भीतर एक कमी पैदा करता है,फिर उसी कमी का इलाज बनकर आता है।वह घाव देता हैऔर मरहम की कीमत तय करता है।तुम्हारी बेचैनीउसकी

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मर्द का दर्द / डॉ विजय कुमार कन्नौजे

विरह और दर्द

मर्द का दर्द / डॉ विजय कुमार कन्नौजे नारी बिना ना मर्द हैंमर्द का एक दर्द है।एक अनजाने कन्या लाकरपालने पोसने का कर्ज है। सिर झुका विनती नार कोहाथ जोड़ अर्ज है।जन्म दाता माता पिता का जिंदगी भरे कर्ज है। मर्द का एक दर्द है।। पाप कर्म किया है मर्दबच्चन पालना फर्ज है माता पिता

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