दर्द से नमस्ते कहो

दर्द से नमस्ते कहो

दर्द आएगा—
यह टाला नहीं जा सकता।
पर भ्रम?
वे वैकल्पिक हैं।

कुछ दर्द
संयोग से आते हैं—
बिना अनुमति।
उन्हें
उतनी ही जगह दो
जितनी ज़रूरी हो।

कुछ दर्द
तुम चुनते हो—
सही बदलाव की कीमत।
उसे
खुले दिल से
स्वीकार करो।

और कुछ दर्द
मूर्खता से पैदा होते हैं—
गलत निर्णय,
बिना देखे उठाए कदम।
यह दर्द क्यों ढोना?

जीवन
लगातार बहता है।
देह और मन
ठहराव चाहते हैं।
यहीं टकराव होता है—
और उसी से
दर्द जन्म लेता है।

पीड़ा क्या है?

पीड़ा शुरू होती है
उसी क्षण
जब तुम मान लेते हो
कि जीवन
दर्दरहित होना चाहिए।

यदि तुम्हें लगता है
कि जन्म
केवल सुख के लिए हुआ है—
तो दुख
तुम्हारा स्थायी साथी बनेगा।

पीड़ा
दर्द नहीं है।
पीड़ा है
दर्द के विरुद्ध
बचपना।

“सब ठीक होना चाहिए था।
यह दर्द क्यों?”
यहीं से
यातना शुरू होती है।

तो मुस्कुराओ।
और कहो—
नमस्ते, दर्द।
आओ मित्र,
चाय लोगे?

अंदर आओ।
झिझको मत।
मेरे भ्रम
उतार दो।

देखो—
मैं तैयार हूँ।

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