क़िस्तों में दिया गया दर्द
हम सीधे
छाती पर चोट नहीं लेते।
हम तैयार नहीं होते
एक सच्चे,
पूरा चीर देने वाले
वार के लिए।
इसलिए मन
चाल चलता है—
एक ही सच को
सौ टुकड़ों में
तोड़ देता है।
घाव रहता है,
पर फैल जाता है।
टल जाता है।
छुप जाता है।
अगर पीड़ा
एक साथ आती—
तीव्र,
अस्वीकार्य—
तो शायद
हमें रुकना पड़ता।
देखना पड़ता।
सच मानना पड़ता।
पर हमने
ज़िंदगी ऐसे रची है
कि
कुछ भी
असह्य न लगे।
हम दर्द को
विकृत करते हैं,
सुन्न करते हैं,
आरामदेह बनाते हैं।
स्पष्टता के बदले
सुविधा चुनते हैं।
सच के बदले
सहनीयता।
वे छोटे-छोटे
चुभन वाले पल
एक साथ नहीं आते।
बीच-बीच में आते हैं—
इतना अंतर देकर
कि हम कह सकें:
मैं संभाल रहा हूँ।
सब सामान्य है।
और भ्रम
चलता रहता है।
हम छोटे घाव
इकट्ठा करते रहते हैं—
और कभी नहीं पूछते:
मैं बचा क्या रहा हूँ?
दिल से जीना
खुले रहने का साहस है।
बिना फिल्टर,
बिना टुकड़े किए—
सीधे
वार लेना।
यदि तुम
छाती पर
सच नहीं ले सकते,
तो
दिल से
जी भी नहीं सकते।
क्योंकि दिल
सौदे नहीं करता।
और
बेईमानी से
संवाद नहीं करता।





