हिंदी कविता

सबसे ख़तरनाक घाव

हिंदी कविता

सबसे ख़तरनाक घाव कोई भीजानबूझकरखुद को नहीं तोड़ता।हम जो भी करते हैं,राहत के नाम पर करते हैं,खुशी के भ्रम में,भागने की चाह में। हम कहते हैं—यह प्रेम है,यह स्वतंत्रता है,यह उपचार है।पर अज्ञाननए नाम पहन लेता है। खुद को चोट पहुँचानाकेवल दवाइयों या धारदार चीज़ों से नहीं होता।यह तब भी होता हैजब हम ज़हर कोआत्मा

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जब सफलता स्वयं को असफल कर दे

समाज और यथार्थ

“जब सफलता स्वयं को असफल कर दे” हम कहते हैं—मैं आगे बढ़ रहा हूँ।तनख़्वाह बढ़ी,पहचान बढ़ी,अनुभव जुड़ते गए। पर किसी ने नहीं पूछा—किसके लिए? जिसके लिएदिन-रात दौड़े,वही भीतरऔर थक गया। पैसा जमा हुआजैसे अलमारी में कपड़े,पर मननंगा ही रहा। डिग्रियाँ आईं,सम्मान मिला,पर नींदऔर हल्की हो गई। अगर यह विकास है,तो फिरघबराहट क्यों बढ़ी? हम जो

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पीड़ित होने का खेल

हिंदी कविता

पीड़ित होने का खेल अहंकारदो भाषाएँ जानता है—अच्छा हुआ तो“मैंने किया”,बुरा हुआ तो“मेरे साथ हुआ।” सफलताउसकी पहचान बन जाए,ऐसा कम ही होता है,इसलिए वहदोष को हीअपनी ढाल बना लेता है। हर चोट के पीछेकोई और होता है—आज वह,कल यह,और हर बारमैं पीड़ित। दयाउसकी प्रिय मुद्रा है,क्योंकि दया मेंबदलाव की माँग नहीं होती। समाधानकठिन है,उसमें स्वयं

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पहले घाव बेचते हैं, फिर मरहम

समाज और यथार्थ

“पहले घाव बेचते हैं, फिर मरहम” वे तुम्हें बताते हैं—तुम अधूरे हो।आईने में नहीं,विज्ञापन में दिखाते हैंतुम्हारा चेहरा। कहते हैं—तुम जैसे हो,वैसे काफ़ी नहीं। यहीं सेसौदा शुरू होता है। पहलेमन मेंकमी बोई जाती है—तुम सफल नहीं,तुम सुंदर नहीं,तुम योग्य नहीं। फिर मुस्कराकरमरहम बढ़ाया जाता है—हमारे लिए काम करो,हमारी परिभाषा कासपना देखो,हमारी चीज़ें ख़रीदो—तभीतुम पूरे होओगे।

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घाव को सहलाना बंद करो

हिंदी कविता

घाव को सहलाना बंद करो घाव जिसे हर रोज़ सहलाया गया,वह कभी नहीं सीखा खड़ा होना।थोड़ी-सी चोट, थोड़ी-सी आलोचना—और हम उसे तकिया, आईना, मरहम दे आए। “कोई बात नहीं, तुम बहुत संवेदनशील हो,”“दुनिया ही ऐसी है”—इन शब्दों से घाव गहरा होता गया,अहंकार मजबूत, पैर कमजोर। क्यों हम नाज़ुकता को प्यार समझ बैठे?क्यों हर आहत को

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“वे प्रेम करते हैं—या सीमित?”

प्रेम और रिश्ते, हिंदी कविता

“वे प्रेम करते हैं—या सीमित?” अगर तुम्हारा उठनाकिसी को चुभता है,तो पूछो—यह प्रेम हैयाडर? जब तुमऊँचाई की ओर बढ़ते हो,और आसपास के लोगआहत हो जाते हैं—तो सच यह नहींकि तुम गलत हो,सच यह हैकि वे रुकना चाहते हैं। प्रेमकभीजंजीर नहीं डालता। प्रेम कहता है—जाओ,और भी ऊपर जाओ,चाहेमैं पीछे रह जाऊँ। जो तुम्हारे सपनों सेअसुरक्षित हो

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कोई विश्वास पवित्र नहीं

हिंदी कविता

कोई विश्वास पवित्र नहीं मैंने देखा एक रोगी—खुलकर बोला, “दवा नहीं चाहिए,मुझे अपनी बीमारी प्यारी है।”कम से कम वह अपने पागलपन में ईमानदार था। पर अधिक खतरनाक है वह,जो मान लेता है कि बीमार है,फिर झूठी दवा थाम लेता है,और मुस्कुराता है,जैसे वह ठीक हो रहा हो।वह न केवल बीमार है,बल्कि चालाक भी है।और उसकी

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“प्रेम आत्मा का प्रतिबिंब है”

समय और जीवन दर्शन, हिंदी कविता

“प्रेम आत्मा का प्रतिबिंब है” तुम कहते हो—मैं यह हूँ,मैं वह हूँ। पर हर वाक्य से पहलेएक शब्दखड़ा रहता है—मैं। नाम बदलते रहते हैं,पद बदलते रहते हैं,पर यह मैंवहीं रहता है। यहीस्वयं है। जीवन की गुणवत्ताघरों, रिश्तों,सुविधाओं से नहीं—इस मैं कीस्वच्छता से तय होती है। अगर स्वयं साफ़ है,तोसंबंध सहज होते हैं। अगर स्वयं उलझा

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बढ़ो, केवल चमको मत

हिंदी कविता

बढ़ो, केवल चमको मत खुद में निवेश करो।दिखावे में नहीं। ईंधन भरो—ज्ञान, कर्म, साधना की।ना कि चमकते आभूषणों की। हीरे जड़ दो डैशबोर्ड में,सोने की हँसी लगाओ दरवाजों पर,पर इंजन को मत भूलो।वरना रॉयल दिखोगे,पर कहीं नहीं पहुँचोगे। समय, ऊर्जा, ध्यान—यह असली इंजन है।छोटे झूठे आभूषणरुकावट बन जाते हैं। वह व्यक्ति जो नई घड़ी पहनता

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जलवायु पतन का भावनात्मक इंजन

मन और भावनाएँ

“जलवायु पतन का भावनात्मक इंजन” हम जंगल से उठे,और जंगल को हीखाने लगे। क्योंकिहम बुद्धि से नहीं,भावना सेचलने लगे। एक इच्छा उठती है—विदेश यात्रा।दिल रोमांच से भरता है।आकाश मेंएक और उड़ान,धरती परएक और बोझ। भावनाकार्बन बन जाती है। एक सपना पलता है—अपना सुरक्षित घोंसला।सीमेंट,स्टील,पेड़ कटते हैं। डर कहता है—और बड़ा,और पक्का। डर भीकार्बन है। एक

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नान्हें कहिनी- टुरी खोजइ

हिंदी कविता

नान्हें कहिनी- टुरी खोजइ “बड़े बिहनिया जाड़ बतास के दिन म कहां जावत हो जी? हाड़ा गोड़ा ठंडा परत हे इहा।” मंगलू किहिस।             “टुरी खोजइ चलत हे कका।चल ना आज कहूं डाहर तही ह लेग।” समारू कहिस। मंगलू कथे चल ना त लेगत हँव। अइसे कहिके समारू अउ मंगलू

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अपनी कमजोरियों का बचाव बंद करो

हिंदी कविता

अपनी कमजोरियों का बचाव बंद करो कोई कमजोर नहीं है।हम बस नाटक करते हैं। सुविधा के लिए टूटते हैं।रीढ़ बेचते हैं।और कहते हैं—“ठीक है, मैं ऐसा ही हूँ।” हम सजाते हैं अपनी कमजोरी।तर्क बनाते हैं।सद्गुणों में बदल देते हैं। पर सच यही है—जिसे तुम सहते रहो,वह बढ़ता है। कमजोर स्व को तिरस्कार दो।उसे पालना बंद

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