हिंदी कविता

अपनी कमजोरियों का बचाव बंद करो

हिंदी कविता

अपनी कमजोरियों का बचाव बंद करो कोई कमजोर नहीं है।हम बस नाटक करते हैं। सुविधा के लिए टूटते हैं।रीढ़ बेचते हैं।और कहते हैं—“ठीक है, मैं ऐसा ही हूँ।” हम सजाते हैं अपनी कमजोरी।तर्क बनाते हैं।सद्गुणों में बदल देते हैं। पर सच यही है—जिसे तुम सहते रहो,वह बढ़ता है। कमजोर स्व को तिरस्कार दो।उसे पालना बंद

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माँ दंतेश्वरी के नाम ले, हिरदय म आस

आध्यात्म और भक्ति, हिंदी कविता

मुखड़ा (Intro) छत्तीसगढ़ के भुइयां म बिखरे उजास,माँ दंतेश्वरी के नाम ले, हिरदय म आस।नाचे धरती, गाए अम्बर,नाचे धरती, गाए अम्बर,और ढोलक की थाप,गरबा संग खो जाए, जीवन संताप। अंतरा 1 (Verse 1) महुए की खुशबू संग, बहती बयार,नाचा के कदमों में, नवजीवन का संसार।तेज तलवारों वाली माँ की जयकार,हर दिल में हो विश्वास और

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सुधार रणनीति नहीं

हिंदी कविता

सुधार रणनीति नहीं सच्चा सुधार तब शुरू होता है,जब तुम अपने आप से झूठ बोलना बंद करो। जब तुम अपनी स्थिति देखोजैसी है वैसी—बिना सजावट, बिना बहाने। मूल्यांकन चुपचाप हो,किसी को बताने की जरूरत नहीं।घाव पहनने की जरूरत नहीं।पर खुद को सच बताना ज़रूरी है। जब स्पष्टता आती है,परिवर्तन अपने आप होता है।झूठ खुद टूट

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कर्मकांड पे व्यंग्य: रैप सॉन्ग (सरल शब्दों में)

आध्यात्म और भक्ति, हिंदी कविता

[Intro]पूजा-पाठ का मेला है,दिखावे का सब खेला है।गंगा में नहाया, पर मन में मैल,कर्मकांड में अटके, टोटल फैल। [Verse 1]सफेद कपड़ा, मन काला,धूप-बत्ती से क्या बदले लाला?पंडित बोले, “दान-दक्षिणा”,पाप से मुक्ति का ढोंग है साला। सुबह मंदिर, रात में ठेका,भक्ति कम, बस दिखावा फैला।मंत्र पढ़े, पर स्वार्थ छुपाए,भगवान से भी सौदा करवाए! [Hook]कर्मकांड, ओ कर्मकांड,भगवान

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क्षुद्र को जाने दो

हिंदी कविता

क्षुद्र को जाने दो (Let the Petty Go) यदि तुम्हारा आत्म-मूल्यकिसी भी चीज़ पर टिका है,तो जीवनउसे डोरियों की तरह हिलाएगा,और तुम्हेंकठपुतली बना देगा। परिस्थितियाँ,संपत्ति,उपलब्धियाँ,मंज़िलें—इनमें से किसी कोअपने नाम की परिभाषा मत बनने दो। जो बाहर हैवह ठहरता नहीं।जो ठहरता नहीं,उस पर आत्म-मूल्य टिकानास्वयं को अस्थिर करना है। आत्म-मूल्य भी एक विचार है,और हर विचारकिसी

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“उनकी आँखों में नहीं”

हिंदी कविता

मैंउनकी आँखों में खोजा गया चेहरा नहीं हूँ,मैं वह साँस हूँजो बिना अनुमति के चलती है। जब दुनिया ने कहा—“तुम ऐसे हो”,मैंने मान लिया,और उसी क्षणअपने भीतर का सिंहासनउधार दे दिया। दूसरों की दृष्टिआईना बनी,और मैंअपने ही प्रतिबिंब काकैदी हो गया। डर तब पैदा हुआ,जब मेरे होने का प्रमाणकिसी और की स्वीकृति बन गया।जहाँ निर्भरता

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पीठ पीछे कुछ टिक रहा है

हिंदी कविता

पीठ पीछे कुछ टिक रहा है समय को सँभालने के उपाय मत पूछो,खुद को सँभालना सीखो। तुम्हारे घंटे,तुम्हारे मिनट—वे घड़ी नहीं,आईना हैं।उनमें दिखता हैतुम्हारा मन,तुम्हारी प्राथमिकताएँ,तुम्हारे असली मूल्य। ट्रेन छूटे तो समझ आता है—समय लौटता नहीं।मौत छुए तो दिखता है—समय अनंत नहीं,हर सेकंड वाष्पित हो रहा है। पर अजीब भ्रम है—सब कुछ जाएगा,पर मैं नहीं।ट्रेन

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दिखावे का मन

हिंदी कविता

दिखावे का मन लोग आईने में नहीं,आँखों में खुद को देखते हैं—दूसरों की आँखों में। दुकान की रोशनी मेंशर्ट नहीं चुनी जाती,अपनी कीमत तौली जाती है—कहीं सस्ते न पड़ जाएँ हम। गला थोड़ा और खुला,जाँघ थोड़ी और ऊपर,कपड़ा नहीं,स्वीकृति पहनी जाती है। फिर वही मनरिश्तों की अलमारी खोलता है—देखो मेरा साथी,देखो मेरा प्रेम,देखो मेरा जीवन।

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जब मन गुर्राए, सुनो

हिंदी कविता

जब मन गुर्राए, सुनो डर, उथल-पुथल, बेचैनी—इन्हें शत्रु मत समझो।ये तुम्हें डराने नहीं,कुछ बताने आते हैं। जब भीतर सब ठीक नहीं लगता,तो उसे दबाओ मत।पूर्ण शांति तुम्हारी प्रकृति है।उससे कम कुछ भीसंकेत है। मन का अशांत होनाकभी यूँ ही नहीं होता।वह उसी बोझ को ढोता हैजिसे तुमने मूल्य दिया है। जो बेकार है,वह क्यों बचा

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स्वयं को देखना

हिंदी कविता

स्वयं को देखना खुद को जानने के लिएमैंने प्रश्न नहीं पूछे,मैंने अपने दिन देखे। घड़ी की सुइयों ने बतायामेरा समय कहाँ गिरता है,और रात ने बतायामेरा मन किसके पास भटकता है। मैंने अपने शब्द नहीं गिने,अपने कदम गिने—वे बार-बारउसी दिशा में जाते रहेजिसे मैं स्वीकार नहीं करता था। मैं बोला—मैं न्याय चाहता हूँ,मैं शांति चाहता

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भय झूठा है—परखो उसे

हिंदी कविता

भय झूठा है—परखो उसे डर किसी घटना से नहीं आता,डर आता हैअपने ही टूट जाने की कल्पना से। तुम कहते हो—“कुछ बुरा हो जाएगा।”पर सच यह है—डर खुदसबसे बुरा हो चुका है। घटना नहीं डराती,तुम्हारी नाज़ुकता डराती है।यह मान लेना कितुम सह नहीं पाओगे। अगर तुम कह सको—होने दो जो होना है,दुनिया बिखर जाए,पर मैं

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खुद से प्यार

हिंदी कविता

खुद से प्यार सचकोई मुलायम तकिया नहीं होता,वह काँटा है—जो भीतर धँसकरहमें जगाता है। दुनिया को बोलने दो।वे मेरे कपड़ों पर बोलेंगे,मेरी त्वचा पर,मेरी आवाज़ पर।ये सतह की बातें हैं—हवा की तरह आती-जाती। पर जहाँ मेरी असली कीमत रहती है,वहाँ किसी का प्रवेश नहीं।न भीड़ का,न अपनों का।वह जगह पवित्र है,और उसकी रखवालीमुझे खुद करनी

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